जब से मैंने होश संभाला है, उम्रदराज लोगों के बारे में दो कहावतें सुनता आया हूं। एक, साठा सो पाठा और दूसरी असिया सो रसिया। मैं जानता हूं कि ये कहावतें उम्रदराज लोगों के लिए मुगालते के सिवाय कुछ भी नहीं हैं। न तो साठ वर्ष का व्यक्ति हट्टा-कट्टा पट्ठा हो सकता है और न रसिक।
बुजुर्गों का ब्लड प्रेशर सामान्य रखने की गरज से ही इन कहावतों को गढ़ा गया होगा। मेरी यह धारणा भी रही है, यदि ये कहावतें सही होती भी होंगी, तो सिर्फ सियासी क्षेत्र में। सियासत में व्यक्ति साठ वर्ष की उम्र में परिपक्व हो जाता है तथा अस्सी तक आते-आते वह सत्ता सुख किसी रसिया के समान ही भोगने लगता है।
इधर हम भी सठिया गए हैं। सरकारी अफसर साठ साल में रिटायर होता है, मगर हमने साठ साल पूरे होने से पहले ही रिटायरमेंट ले लिया। इस घटना के पीछे हमारे मित्रों और शुभचिंतकों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। रिटायरमेंट से पहले वे हमसे कहते, अरे! अभी तक आप रिटायर नहीं हुए। ऐसा कहते समय उनकी भाव-भंगिमा ऐसी होती, जैसे मैंने सरकारी रिकॉर्ड में अपनी जन्मतिथि गलत लिखवा दी हो। यह जानकर कि अभी रिटारयमेंट में समय बाकी है, वे हताश हो जाते।
बहरहाल सठियाने के बाद अब मैं इसके साइड इफैक्ट्स का सामना कर रहा हूं। लोग अयाचित राय देने लगे हैं। नमक, चीनी बंद कर दो। शुगर पर ध्यान रखना। उधर कुछ देशभक्त टाइप के लोग मेरे सठियाने की तुलना आजादी के सठियाने से करते हैं। उनका तर्क है कि देश में जितने भी महाघोटाले हुए हैं, आजादी के साठ वर्ष बाद ही हुए हैं। यह सब आजादी के सठिया जाने का प्रमाण है। तुम भी इससे बच नहीं सकते।
सठिया जाने के बाद मुझे मेरे दादाजी बेतरह याद आने लगे हैं। किशोरावस्था में जब मैं कोई गलती करता था, तो वह कहते, ब्राह्मण का बेटा साठ साल तक ‘पोंगा’ रहता है, और साठ साल का होते ही सठिया जाता है। मैं साठ वर्षों तक मूर्खतापूर्ण हरकतें करता रहा और खुद को लेखक-कवि वगैरह समझता रहा।
मनोवैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया है कि मूर्खता और लेखक का चोली दामन का साथ होता है। लोगों का कहना है कि सठियाने के बाद ‘फिसल जाने’ की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। बड़े-बड़े सियासतदां सठियाने के बाद ‘फिसलते’ देखे गए हैं। साहित्यकारों में, सठियाने के बाद वैचारिक फिसलन के ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे।