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बढ़ते शहर और दम तोड़ती भाषाएं

Tue, 27 Aug 2013 07:34 PM IST
उमेश चतुर्वेदी
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औद्योगिक क्रांतियों और विकास के लिए हो रहे बदलावों को चाहे कितना भी जायज ठहराया जाए, सच यह है कि ऐसी क्रांतियां और बदलाव सांस्कृतिक तब्दीली भी लाते हैं, जिसका सबसे ज्यादा असर भाषाओं, बोलियों और प्रभावित होने वाले समुदायों की शब्द संपदा पर पड़ता है।
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इस सिलसिले में अब तक मुकम्मल अध्ययन नहीं हुए। भाषा और बोलियों की परिभाषा में उलझे रहने वाले विश्वविद्यालयों के भाषा विज्ञान विभागों को यह कभी मौका ही नहीं मिला कि देश की जातीय संस्कृति की प्रतीक रही भाषाओं और बोलियों का हश्र जाना जाए।

शुक्र है कि अपने सीमित संसाधनों में बड़ोदरा के भाषा शोध और प्रकाशन केंद्र ने तीन साल तक चले एक अध्ययन के बाद नतीजा निकाला है कि देश में 1961 के बाद कम से कम बीस फीसदी भाषाएं या तो मर गईं या लुप्त हो गईं हैं।
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अब सवाल उठता है कि आखिर 1961 को ही पैमाना क्यों बनाया गया, तो इसकी बड़ी वजह है कि इसी साल तक जनगणना का एक आधार भाषाएं भी रहीं। उस वक्त के सरकारी मानकों के मुताबिक भाषा विज्ञान के ठीक उलट उस बोली को भाषा माना गया, जिसे बोलने वालों की संख्या दस हजार या उससे ज्यादा थी। उस जनगणना के मुताबिक, देश में करीब 1,100 भाषाएं थीं। 1971 से लेकर अब तक जितनी भी बार जनगणना हुई है, भाषाई आधार गायब कर दिए गए।

बहरहाल, भाषा शोध और प्रकाशन केंद्र ने अपने अध्ययन नतीजों में पाया है कि 1,100 में से इन दिनों सिर्फ 780 भाषाएं ही जिंदा हैं। उनमें सबसे ज्यादा मछुआरों और बंजारों के करीब 190 समुदाओं की भाषाएं और उनकी शब्द संपदा पूरी तरह खत्म हो चुकी है।

आखिर ये भाषाएं क्यों मरीं...इस सवाल का जवाब तलाशते वक्त नृतत्वशास्त्र के सिद्धांतों की तरफ देखना होगा। माना जा रहा है कि विकास का पैमाना बन चुका महानगरीकरण संस्कृतियों का श्मशानगृह भी साबित हो रहा है। महानगरीकरण ने बंजारों को भी एक जगह ठहरने और उनके पारंपरिक व्यवसायों के बजाय मौजूदा जिंदगी के फलसफे पर जिंदगी गुजारने को मजबूर किया है।

बेशक इससे कुछ जगहों पर उनकी माली और सामाजिक हैसियत बेहतर हुई होगी, लेकिन इस बेहतरी ने एक संस्कृति को ही खत्म कर दिया और उसके साथ कई भाषाएं भी खत्म हो गईं। यही हालत मछुआरों से जुड़े समुदायों की भी है। असल में, शहरीकरण व्यक्ति को अपने मूल से काटता है।

इस जद्दोजहद में मूल और उस खास विशेष शहर की संस्कृति के बीच मुठभेड़ होती है और एक हद तक उसमें नई संस्कृति विजयी होती है और एक नई संस्कृति का जन्म होता है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में मूल का बहुत कुछ पीछे छूट जाता है।

ऐसा नहीं कि आज जो भाषाएं जिंदा हैं, उनकी शब्द संपदा वैसी ही है, जैसी तीस-चालीस साल पहले थी। जिस तरह हिंदीकरण देसी भाषाओं पर और हिंदी समेत सभी भाषाओं पर अंग्रेजी हावी हुई है, उसका हश्र यह हुआ है कि देसी भाषाओं और उनमें से भी खास साहित्यिक दर्जा हासिल नहीं कर पाईं भोजपुरी, मगही और अवधी जैसी बोलियों-भाषाओं के कई सारे पारंपरिक शब्द लुप्त हुए हैं।

इस प्रक्रिया में हिंदी के भी ढेरों शब्द अब शब्दकोशों तक ही सीमित रह गए हैं। यानी समस्या सिर्फ भाषाओं के खत्म होने का ही नहीं, बल्कि मौजूदा बोलियों-भाषाओं की घटती शब्द संपदा का भी है।

भाषा के बारे में एक कहावत है- भाषा बहता नीर। यानी भाषाएं कुछ नया ग्रहण करती रहती हैं। लेकिन उदारीकरण के दौर की नई संस्कृति में अपने मूल से विचलन के बाद नया अपनाने की प्रक्रिया बढ़ तो रही है, पर पुराने का साथ छूट रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह समस्या छोटे भाषिक परिवारों और समुदायों के साथ ज्यादा हो रही है। उन भाषाओं को भी कठिनाई है, जिन्होंने अभी तक कोई मानक लिपि अख्तियार नहीं की है।

ऐसे में आखिर क्या किया जाए? विशेषज्ञ कहते हैं कि शहरीकरण को बेशक रोका नहीं जा सकता, लेकिन शहरों में आकर बसने वाले छोटे भाषायी परिवारों और समुदायों की भाषाओं को जिंदा रखने के लिए माहौल जरूर मुहैया कराया जाना चाहिए। अंडमान के जावरा समुदाय को बचाने के लिए कदम बढ़ा चुकी सरकार क्या इस दिशा में भी आगे बढ़ सकती है?
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