वह देख सकते हैं। मौका आने पर देखते भी हैं। फिर भी यही कोशिश करते हैं कि अपनी तरफ से कुछ न देखें। उनका मानना है कि खुद देखने लग जाओ, तो सहायक आलसी, कामचोर और निकम्मे हो जाते हैं। जब सरकार ने यह सुविधा दे रखी है कि अपनी तरफ से कुछ न देखें, तो उनको क्या पड़ी है कि फटे में आंख डालें।
सच बताएं, तो वह यह भूल चुके हैं कि उन्हें कुछ देखना भी आता है। जब तक कोई उनकी आंखों के सामने लाकर देखने का निवेदन नहीं करता, वह खुली आंखों से कुछ भी न देखने की जिद पर जमे रहते हैं।
ऐसा भी नहीं है कि दफ्तर की यह अदा घर पर भी नजर आती है। घर की तो हर हरकत पर उनकी नजर रहती है कि कौन क्या लाया है या कौन क्या दे गया है। वैसे तो वह किसी को बंगले पर आने ही नहीं देते, मगर ‘काम’ के लोग तो बुलाने ही पड़ते हैं न! घरवाले इस बात से परेशान रहते हैं कि उन्हें यहां सब कुछ कैसे नजर आ जाता है, जबकि दफ्तर में यह सुविधा रहती है कि जो देखना चाहते हैं, वही देखते हैं।
यह देखिए सर...यह रहा पहले वाला पुल, जो टूट-फूट गया था। और यह रहा नया पुल। कम लागत और कम समय में तैयार हो गया है। पुल के आसपास जो हरियाली नजर आ रही है न, हमने जितने पेड़ यहां से काटे थे, उससे दोगुने लगवा दिए हैं। फोटोग्राफर ठीक से नहीं ले पाया, तो पेंटर से बनवा लिए हैं। साफ नजर आ रहे हैं। उन्हें पुल, हरियाली और...सब कुछ नजर आने लगता है। कल ही तो बंगले पर ठेकेदार आया था मिठाई के डब्बे में कुछ लेकर। और बिल पर दस्तखत हो जाते हैं।
यह नाला अभी अपन ने साफ करवाया है, सहायक बताता है।
कौन-सा नाला...कहां से साफ नजर आ रहा है। मुझे तो वैसा ही दिखाई दे रहा है, जैसा छह महीने पहले था। उन्होंने अंतरात्मा का वीडियो ऑन कर दिया था।
अब देखिए...यहां से ठीक दिखेगा आपको। गलती मेरी थी, गलत व्यू दिखा रहा था। कहते हुए सहायक ने एक बड़े-से खाली प्लॉट का चित्र दिखाया।
हां...तो इस तरह से दिखाया करो न! साफ नजर आ रहा है कि यह नाला नहीं, नदी की तरह हो गया है। कितना मनोहारी दृश्य है। लाओ, बिल पर दस्तखत कर दूं। प्लॉट का चित्र देखते हुए उन्होंने नाले की सफाई का बिल पास कर दिया।