भारतीय फिल्म उद्योग में एक परंपरा काफी पुरानी है, और वह है, शुक्रवार को फिल्म रिलीज करना। इस दिन बड़ी फिल्मों के बड़े कलाकार काफी डरे-सहमे रहते हैं। शुक्रवार से पहले ही उनकी रातों की नींद गायब हो जाती है। फिल्म प्रोड्यूसर अपने मनपसंद सिनेमाघरों को फोन कर यह जानने में जुट जाते हैं कि रिलीज होने वाली उनकी फिल्मों की एडवांस बुकिंग का क्या हाल है।
शुक्रवार युवाओं को भी सप्ताह में कम से कम एक दिन अपनी योजना बनाने का मौका देता है। वैसे युवा, जो नई फिल्मों को पहले दिन ही जरूर देखते हैं, अपने सभी अन्य कार्यों को छोड़कर दोस्तों के साथ फिल्म देखने की योजना बनाने लगते हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी इस दिन को विशेष तवज्जो देता है। फिल्मों का प्रचार करता है। बावजूद इसके इतिहास कभी-कभी ही बनता है।
कोई चालीस वर्ष पहले वह शुक्रवार की दोपहर ही थी, जब जंजीर फिल्म रिलीज हुई थी। फिल्म में कोई नामचीन चेहरा नहीं था। जया भादुड़ी को एक हिट फिल्म की दरकार थी, और प्रकाश मेहरा जंजीर की स्क्रिप्ट पर फिल्म बनाने की वजह से बड़े कलाकारों द्वारा ठुकराए जा चुके थे। उस दोपहर 12 बजे एक अनजाना चेहरा रुपहले परदे पर विजय का किरदार निभा रहा था। ठीक दो बजकर तीस मिनट पर फिल्म जब खत्म हुई, तो वह अनजाना कलाकार फिल्म उद्योग का हीरो बनकर उभरा। कहने की जरूरत नहीं कि वह अमिताभ बच्चन थे। इस तरह जाने-अनजाने में यह धारणा बन गई कि फिल्म उद्योग के लिए शुक्रवार ही वह दिन है, जो किसी भी कलाकार को बनाता है।
हालांकि अब ये सभी परंपराएं किस्मत को कुचलती दिख रही हैं। अब भारतीय सिनेमा की अस्सी साल पुरानी जीवनशैली पुनर्स्थापित की जा रही है। यह इसलिए हो रहा है, क्योंकि निर्माताओं को 'क्लासिक' फिल्म से कहीं अधिक चिंता शुरुआती सात दिनों में फिल्म लागत निकालने की है।
असल में, शुक्रवार को फिल्म रिलीज करना हॉलीवुड की रणनीति थी। वहां के वितरकों को लगता था कि शुक्रवार को फिल्म रिलीज करने से सप्ताहांत का फायदा उन्हें मिल सकता है। दरअसल, 1920 के दशक में अमेरिकी उद्योगों ने हफ्ते में पांच दिन के कार्य-दिवस को अपनाया। शनिवार और रविवार अन्य कामों के साथ ही आम लोगों के लिए पारिवारिक मेल-मिलाप का भी होता था। आधुनिक समय में इसमें फिल्म देखना भी शामिल हो गया। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद हॉलीवुड जब भारत पहुंचा, तो भारतीय फिल्म वितरकों ने भी उसी शैली को अपना लिया। तब एकमात्र लखनऊ के सिनेमाघरों ने यह फैसला किया कि वे एक दिन पहले यानी बृहस्पतिवार को ही फिल्म दिखाएंगे और आम लोगों की रुचि/ अरुचि से क्षेत्रीय फिल्म वितरकों को अवगत कराएंगे।
बहरहाल, अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। कुछ प्रयोग जरूर हुए, लेकिन वे दर्शकों का ध्यान खींचने में विफल रहें। जैसे कि हिम्मतवाला फिल्म 27 मार्च (मंगलवार) को इस उम्मीद के साथ रिलीज हुई कि उसे पूरे सप्ताह का फायदा मिलेगा, लेकिन वह फ्लॉप साबित हुई। बेशरम भी दो अक्तूबर, जो कि बुधवार था, रिलीज हुई, लेकिन फ्लॉप रही।
अलबत्ता वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई और चेन्नई एक्सप्रेस जैसी फिल्में बृहस्पतिवार को रिलीज हुईं और दोनों ने व्यावसायिक रूप से इतिहास रच दिया। वैसे आने वाले पखवाड़ों में भी शुक्रवार को पवित्र मानकर फिल्म रिलीज करने की परंपरा टूटेगी। कृष 3 सोमवार को दिवाली के अवसर पर रिलीज हो रही है। क्रिसमस का दिन भी फिल्म वितरकों के लिए शुक्रवार से अधिक महत्वपूर्ण साबित होगा।
ऐसे में यह दिलचस्प सवाल है कि आखिर शुक्रवार का होगा क्या? जाहिर है, उदार फिल्म निर्माताओं के लिए यह दिन खास बना रहेगा। ऐसे निर्माता कई हैं। अगर छोटे निर्माताओं की फिल्म शुक्रवार को आती है और हिट होती है, तो कोई दिक्कत नहीं होगी, लेकिन अगर छोटी फिल्में पिट जाती हैं, तो बड़े फिल्मकार इन फिल्मों के रिलीज दिन का इस्तेमाल अपनी बड़ी फिल्मों के लिए कर सकते हैं।
रिलीज के दिनों में बदलाव हॉलीवुड को भी प्रभावित कर सकता है। आखिर तमाम अनिच्छाओं के बाद भी वे अपने देश के अन्य व्यवसायों में भारतीय परंपराओं का पालन कर ही रहे हैं, तो फिर फिल्मों में वे क्यों नहीं कर सकते?