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जूता काटता है तो वापस कर दोगे?

Thu, 22 Oct 2015 06:44 PM IST
सुधीर विद्यार्थी
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साधो, मैं दुकान से एक जोड़ी जूते लेकर आया और पहन कर पूरे दिन बाजार में घूमता रहा। अगले दिन उसे लौटाने गया। मैंने दुकानदार से कहा, यह जूता अब पैर में काटने लगा है। वह बोला, इसमें दोष जूते का नहीं, पैर का है। जरूरी नहीं कि जूते की विचारधारा आपके पैरों के चाल-चलन से मेल खाए।
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मैंने इसके लिए कंपनी को जिम्मेदार ठहराया। मैंने जोर देकर कहा कि कंपनी बदचलन है, इसलिए मैं यह जूता लौटाने आया हूं। वह बोला, इससे क्या फर्क पड़ता है कि जूता किस कंपनी का है? जूता सिर्फ जूता है। फिर वह चाहे चमड़े का हो या चांदी का। मुझे लगा कि दुकानदार पढ़ा-लिखा और दार्शनिक किस्म का व्यक्ति है। मैंने जोर देकर कहा कि इस जूते को अब अपने पास नहीं रख सकता। यह मेरे लिए बेकाम हो चुका है। दुकानदार बोला, जनाब यह जूता है, साहित्य अकादेमी का पुरस्कार नहीं, जिसे आप जब जी चाहे, लौटा दें। जूता खरीदते समय ऐसी कोई शर्त नहीं थी कि आप इसे पहनने के बाद वापस कर देंगे। अगर सब ग्राहक इसी तरह करने लगें, तो हमारी दुकानदारी का क्या होगा?

फिर उसने सुझाव दिया, जूता जहां पर काटता है, उस जगह आप कोई कपड़ा या रूई लगा लें। कुछ समय बाद आप जूते के काटने के अभ्यस्त हो जाएंगे। फिर यही जूता आपको सुख देगा। हर किसी की तमन्ना होती है कि उसे नए जूते मिले। पर वह समय से पहले प्राप्त नहीं होता। इसके लिए यह तो नहीं कि पुराने जूते का आप तिरस्कार कर दें। आखिर यह जूता पहन कर आपने मंजिलें पार की हैं। इसे पहनकर आपकी शोहरत में इजाफा हुआ है। आपने भी इसे जूता नहीं, तमगे सरीखा प्यार दिया है।
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उस दिन को याद करिए, जब आप यहां इसे लेने आए थे, तब आपके चेहरे पर खुशी की चमक थी। समझ में नहीं आता कि यह जूते आपके लिए सिरदर्द कैसे बन गए। कहीं साहित्यकारों को पुरस्कार लौटाते देखकर तो आप जूता लौटाने नहीं आ गए? ऐसा लगता है कि आपको जूते से भी अधिक शिकायत कंपनी से है। तब भी जूते इसका खामियाजा भला क्यों भुगतें?
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