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गालियां अपने पास ही रखो

Mon, 22 Jul 2013 09:14 PM IST
शिवकुमार गोयल
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भगवान बुद्ध एक बार मगध के एक गांव में पहुंचे। गांव का मुखिया दुर्व्यसनों में लिप्त रहता था। देवी को प्रसन्न करने के नाम पर वह मूक पशुओं की बलि देता था। बुद्ध ने अपने उपदेश में हिंसा और दुर्व्यसनों का विरोध किया, तो वह आगबबूला हो उठा। उसने गांव वालों से उन्हें भिक्षा न देने को कहा। बुद्ध को इसकी भनक लग गई। वह भिक्षा मांगने मुखिया के घर ही जा पहुंचे।
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मुखिया ने उन्हें देखते ही अपशब्द कह डाले। वह बोला, भीख मांगते हुए लज्जा नहीं आती? धर्म के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाते हो। बुद्ध ने मुस्कुराते हुए कहा, वत्स, हम दुर्गुण दूर कर सद्गुण ग्रहण करने का उपदेश देते हैं। दुर्व्यसन, अहंकार, घृणा त्यागकर सत्कर्म करो, तभी जीवन सफल होगा। बुद्ध के इन वचनों का उस पर प्रभाव नहीं पड़ा। उसने चिल्लाकर कहा, तू यह नहीं जानता कि किसके सामने खड़ा है। मैं इस गांव का मालिक हूं। यहां से निकल जा। इसी में तेरी भलाई है। महात्मा बुद्ध ने धैर्य के साथ कहा, मैं तुम्हारे पास भिक्षा मांगने आया था, तुमने उसके बदले गालियां दीं। मैं इन गालियों को स्वीकार नहीं करता। इन्हें तुम अपने पास ही रखो।

बुद्ध के शब्दों ने मुखिया के हृदय को झकझोर दिया। वह उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगा। बुद्ध ने उसे उपदेश देते हुए कहा, निरीह पशुओं की हत्या घोर पाप है। मांस-मदिरा से बुद्धि भ्रष्ट होती है। सत्य का पालन और दया भावना ही कल्याणकारक है।
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