संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार जब 2004 में सत्ता में आई थी, तब आम आदमी के हित में और समावेशी विकास आदि के बड़े-बड़े दावे किए गए थे। अब उन दावों की हकीकत को परखने का वक्त आ गया है। यहां हम उद्योग को परखेंगे, जिसकी वृद्धि को किसी देश की आर्थिक प्रगति का मानदंड माना जाता है।
पहली नजर में, संप्रग शासन में औद्योगिक वृद्धि शानदार नजर आती है। 2005 से 2013 के दौरान औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) की वार्षिक वृद्धि 9.4 फीसदी, 9.7 फीसदी, 12.2 फीसदी, 9.7 फीसदी, 4.4 फीसदी, 8.4 फीसदी, 8.2 फीसदी, 2.9 फीसदी और 0.7 फीसदी रही है। साफ है कि आईआईपी की तरह देश की आर्थिक विकास दर भी शुरुआत के वर्षों में शानदार थी, लेकिन बाद में इसमें गिरावट आई। मगर ये आंकड़े वास्तविक हालात बताने में नाकाम हैं।
इनसे नीति निर्माण संबंधी ऊहापोह और निवेश माहौल को बर्बाद करने वाले कारण भी स्पष्ट नहीं होते, जिनके नतीजे अब महसूस किए जा रहे हैं। सुधार की उम्मीदों को धता बताते हुए मई में औद्योगिक उत्पादन 1.6 फीसदी नीचे आ गया। औद्योगिक मंदी का मूल कारण वैचारिक रूप से कट्टर वामपंथ का दोबारा उभार है। वामपंथियों से मेरा तात्पर्य केवल चार वर्षों (2004-08) तक संप्रग को बाहर से समर्थन देने वाले वाम मोर्चे से ही नहीं, बल्कि वामपंथी झुकाव वाले बुद्धिजीवियों और शिक्षाविदों से भी है।
वामपंथ के उभार से गुमराह करने वाले उस सिद्धांत को नई जिंदगी मिल गई, जिसमें माना जाता है कि अगर श्रमिक कष्ट में रहेंगे, तभी कारोबारी संपन्न हो सकते हैं और इसी तरह अगर कारोबारी कष्ट में रहेंगे, तो श्रमिकों में संपन्नता आ सकती है। इस सिद्धांत के तहत आर्थिक सुधारों की गति रोकी गई और समाजवादी दौर के कुछ प्रतिकूल विचारों और परंपराओं को दोबारा जिंदा किया गया। और इस तरह आमतौर पर कारोबारियों की जिंदगी को कष्टपूर्ण बनाया गया।
हालांकि नई आर्थिक नीति के कारण अर्थव्यवस्था ने जो ताकत हासिल की थी, उससे न केवल राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) और वामपंथियों के शुरुआती प्रतिरोध का सामना करने में मदद मिली, बल्कि शुरुआती वर्षों में अर्थव्यवस्था तेज गति से आगे भी बढ़ी। पिछले वर्षों के दौरान, एनएसी के उत्साही सदस्यों और अन्य क्रांतिवीरों ने अर्थव्यवस्था की जमीन के नीचे लैंडमाइन बिछा दिया। आदिवासियों, गरीबों आदि की मदद के नाम पर कई परियोजनाएं इस लैंडमाइन की चपेट में आ गईं।
देश के सबसे बड़े प्रत्यक्ष विदेशी निवेश वाली 72,000 करोड़ रुपये की पॉस्को परियोजना का काम ओडिशा में अभी शुरू नहीं हो पाया है। कोरियाई इस्पात कंपनी पहले ही कर्नाटक में 31,800 करोड़ रुपये की परियोजना बंद कर चुकी है। इसके बाद आर्सेलर मित्तल ने लाल फीताशाही, भूमि अधिग्रहण तथा लौह अयस्क की दिक्कतों की वजह से 50,000 करोड़ के प्रस्तावित इस्पात संयंत्र से हाथ खींच लिए।
इसके अलावा ओडिशा में वेदांता संयंत्र, छत्तीसगढ़ में टाटा स्टील और कई अन्य परियोजनाएं विभिन्न कारणों से या तो रुकी हुई हैं या फिर उनकी गति धीमी है। कुछ नीति निर्माताओं ने एनएसी को खुश करने वाले फैसले लिए। पर्यावरण मंत्री रहते हुए जयराम रमेश ने कोयला परियोजनाओं के लिए जंगलों में 'गो' और 'नो गो' क्षेत्र चिह्नित किया, जिससे करीब 66 करोड़ टन कोयला हमारे इस्तेमाल के दायरे से बाहर हो गया। चूंकि हमारे यहां सबसे ज्यादा बिजली कोयला-आधारित संयंत्रों से प्राप्त होती है, इसलिए रमेश के कदम से ऊर्जा क्षेत्र पर नकारात्मक असर पड़ा, खासकर दक्षिण भारत में।
आंध्र प्रदेश सरकार के अनुसार, 2012-13 में बिजली की कमी के चलते उत्पादन में तकरीबन 30,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। कोयंबटूर की हालत भी कुछ अलग नहीं है, जहां बिजली की कमी के चलते 5,000 से ज्यादा छोटे उद्योग बंद हो गए। तमिलनाडु एसोसिएशन ऑफ कॉटेज ऐंड माइक्रो इंटरप्राइजेज की तरफ से बताया जा रहा है कि इसके कारण राज्य में 50,000 नौकरियां खत्म हो गईं।
दूसरे शब्दों में कहें, तो गरीबों और पर्यावरण के लिए लड़ने वाले स्वयंभू क्रांतिवीरों की अति सक्रियता के कारण हर प्रकार के और हर आकार के उद्योग-धंधे प्रभावित हुए हैं। वित्त मंत्री पी चिदंबरम, वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने अमेरिका जाकर वहां के निवेशकों को आकर्षित करने के प्रयास किए हैं, पर हमारी व्यवस्था और राजनीतिक गठजोड़ वाले क्रांतिवीरों के कारण भारतीय कारोबारी अपने देश में निवेश करने से कतरा रहे हैं।
ऐसा लगता है, मानो हम एक उपनिवेश बनते जा रहे हैं, जैसा कि 18वीं शताब्दी के आखिर में और 19वीं शताब्दी के शुरू में हुआ था। ये हालात किसी औपनिवेशिक सरकार की वजह से नहीं, बल्कि हमारी अपनी सरकार की खराब नीतियों और स्वयंभू क्रांतिवीरों की हरकतों की वजह से है।
पिछले वर्षों के दौरान किसी ठेठ उपनिवेश की तरह ही भारत लौह अयस्क जैसे कच्चे माल का निर्यात और तैयार उत्पाद का आयात कर रहा है। इसके अलावा हम चीन, तुर्की, वियतनाम इत्यादि के विपरीत गारमेंट्स के बजाय टेक्सटाइल्स ज्यादा निर्यात करते हैं। यह स्थिति तब है, जब इस क्षेत्र में हम अपनी क्षमता साबित कर चुके हैं। असल में परेशानी की मूल वजह प्रक्रिया संबंधी कठिनाई और नौकरशाही की उदासीनता ही नहीं है, बल्कि वैचारिक प्रतिबद्धता वाले बौद्धिक कार्यकर्ता भी हैं, जो सैद्धांतिक रूप से विकास विरोधी हैं।