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शताब्दी पुरुष सत्यजित का काव्य छंद

गौतम चटर्जी
Updated Sun, 02 May 2021 07:18 AM IST

सार

सत्यजित राय ने दूसरों की मूल कहानी को आत्मसात कर उसे सिनेमा में विस्तृत कर उसका वृहत्तर अर्थ सुनिश्चित किया है। वह विजुअल स्टोरी टेलिंग के प्रथम पुरुष हैं। विशव सिनेमा में उनकी साख इसी कारण है।
 
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सत्यजित राय (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया


प्रभात फिल्म्स के बाद और बॉम्बे टॉकीज से पहले कोलकाता ने उसी साल न्यू थियेटर्स की नींव रखी थी, जिस साल हमारा सिनेमा सवाक हुआ था। बीती सदी के तीस और चालीस के दशकों में बांग्ला में बनी जिन दो फिल्मों ने भारतीय सिनेमा की आधुनिक या बौद्धिक दिशा तय की, वे न्यू थियेटर्स की फिल्में थीं, मुक्ति और उदयेर पॅथे।  रवींद्रनाथ का गान अपने पूरे स्वरूप में पहली बार उदयेर पॅथे फिल्म में है, जो बाद में हमारा राष्ट्रगान बना। हम देख सकते हैं कि राय की अपराजितो में हमेशा के लिए उजड़ गए घर को दिखाने के लिए घर में सांप को दिखाने का बोध या देवी में गृहस्वामी के आने का संकेत उनके खड़ाऊं की आवाज से दिखाने का अंदाज राय के उदयेर पॅथे संस्कार में सुरक्षित था। उदयेर पॅथे में सांप की जगह बिल्ली है और खड़ाऊं की जगह चमड़े की नई चप्पल है। राय की विश्व सिने चेतना में भी प्रारंभिक प्रभाव इसी तरह के दिखते हैं, जैसे गुपी गाइन बाघा बाइन में भूतों के नृत्य का इमेज बर्गमैन की सेवेन्थ सील से अविकल लिया गया।

जन्म शतवार्षिकी जीने के इस प्रस्थान बिंदु पर हमें दो बातें नए ढंग से दिख सकती हैं। पहला तो यह कि जलसाघर से हम राय की फिल्मों को राय की ओर से देख सकते हैं। राय की ओर से उनकी उन फिल्मों को देखने का, जो कहानी या उपन्यास पर बनी है, तात्पर्य यह है कि हमें उनकी फिल्मों की तुलना उस कहानी से करनी चाहिए, जिसे राय ने लिखी है। उन्होंने मूल कहानी को आत्मसात कर उसे सिनेमा में विस्तृत करने की कल्पना की है, उसका वृहत्तर अर्थ सुनिश्चित किया है।



आम समीक्षक अक्सर आम दर्शक की तरह फिल्म की तुलना प्रेमचंद की लिखी कहानी से करने लगते हैं और पूरा विमर्श ही निरर्थक हो जाता है। फिर शरत के देवदास पर बनी प्रमथेश बरुआ या बिमल रॉय की फिल्म और विभूतिभूषण के पॅथेर पांचाली पर बनी फिल्म का फर्क मिट जाता है। फाल्के से लेकर पी सी बरुआ और बिमल रॉय तक लिखी कहानी को कहने का ढंग वही है, जो शरत का है, सिर्फ फिल्म माध्यम का फर्क है। राय के यहां ऐसा नहीं है। कहने का ढंग ही प्रेमचंद से अलग है। देवी को उन्होंने उस तरह नहीं कहा है, जिस तरह प्रभात कुमार मुखर्जी ने कहा है। प्रभात कुमार की कथा और राय की पटकथा में मौलिक अंतर है। भारतीय सिनेमा में स्टोरी टेलिंग की यह नई परंपरा सत्यजित राय ने शुरू की।

राय की एक फिल्म है कांचनजंघा। कांचनजंघा देखने कई चरित्र पहाड़ पर इकट्ठा हुए हैं, लेकिन उन्हें वह दिखता तब है, जब मुख्य चरित्रों के मन पर पड़ा अंतर्द्वंद्व का कोहरा हट जाता है। प्रतीकात्मक रूप से भीतर कोहरा हटते ही बाहर भी कोहरा छंट जाता है और कांचनजंघा एक पहाड़ी सौंदर्य स्थल न होकर किसी विचार का रूपक बन जाता है। ऐसा फिल्म के अंत में स्पष्ट होता है, आरंभ में नहीं। 1962 में बनी इस फिल्म की कहानी राय ने लिखी है। फिर उस पर पटकथा तैयार की।



किसी जगह को ही आंतरिक जगत का प्रतीक बना देने की यह कोशिश उनकी पहली और अंतिम है। विश्व सिनेमा में भी ऐसा पहली बार हुआ। यह सत्यजित का काव्य छंद है। यह उनका भारतीय सिनेमा में दूसरा महत्वपूर्ण अवदान है। बिंब छंद में ऐसी पटकथा उनसे पहले सिनेमा में नहीं लिखी गई थी। तारकोव्स्की की मिरर की तरह राय का सिनेमा काव्यात्मक यानी पोएटिक सिनेमा नहीं है। न ही उनकी फिल्मों में हम बर्गमैन की तरह दार्शनिक प्रत्यय देखते हैं। इस तरह राय का सिनेमा क्लासिक सिनेमा भी नहीं है। लेकिन जीवन अनुभव के सूक्ष्म अवलोकन का पटकथा में सम्यक-सुविन्यस्त प्रयोग और संदर्भ का ध्यान बारीकी से रखने की मानसिकता परवर्ती फिल्मकार सीख सकते थे, जो ऋतुपर्णो घोष की पीढ़ी न सीख सकी। हम उन्हें बिंब छंद का फिल्मकार कह सकते हैं। इस अर्थ में राय विजुअल स्टोरी टेलिंग के प्रथम पुरुष हैं जिसका सामान्य आरंभ फाल्के ने किया था। विश्व सिनेमा में उनकी साख इसी कारण है।

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