अन्नाद्रमुक के 134 विधायकों ने शशिकला को अपना नेता चुन लिया है और वह तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की कमान संभालने के लिए तैयार हैं। लेकिन राजनीति की असली कहानी यहां से शुरू होती है। शशिकला को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनने के लिहाज से उनके लिए मौसम प्रतिकूल है। शशिकला को कानूनी उलझनों को लेकर भी अग्निपरीक्षा देनी पड़ेगी। जयललिता की आय से अधिक संपत्ति मामले में सर्वोच्च न्यायालय अपना फैसला सुनाने वाला है, जिसमें शशिकला भी दूसरी आरोपी हैं। जैसे ही एक बार इस मामले में शीर्ष अदालत का फैसला आएगा, तमिलनाडु को वैधानिक संकट का सामना करना पड़ेगा।
शशिकला को केंद्र की भाजपा सरकार को भी खुश रखना होगा, क्योंकि उन्हें चार वर्षों से अधिक समय तक राज्य में शासन का संचालन करना है। राज्य को चलाने के लिए केंद्रीय वित्त एवं बजटीय आवंटन बेहद महत्वपूर्ण है। यह तभी मिल सकता है, जब शशिकला प्रधानमंत्री मोदी को अपने पक्ष में कर लेती हैं। जयललिता के निधन के बाद मोदी के हाव-भाव से यह लग रहा था कि वह शशिकला के काफी करीब हैं। शशिकला ने अलग जाकर मोदी से बात की थी। लेकिन यह तथ्य लोगों के सामने आना बाकी है कि मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री से परिचित हैं। एक हफ्ते के समय में शशिकला को राज्य का बजट पेश करना होगा। यह उनका दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, इसलिए दूसरी सबसे बड़ी समस्या भी।
तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण चुनौती कानून-व्यवस्था को लेकर है, खासकर हाल ही में हुए छात्रों के आंदोलन को देखते हुए। चौथी चुनौती शशिकला के सामने राज्य में सूखे की स्थिति से निपटने के लिए उस पर ध्यान केंद्रित करने की है। पांचवीं चुनौती जाति एवं समुदायों के बीच तालमेल बिठाने की है। अन्नाद्रमुक थेवरों की पार्टी के रूप में जानी जाती है। थेवर अन्य पिछड़ा वर्ग में आते हैं। तमिलनाडु की राजनीति को 16 उपजातियां प्रभावित करती हैं। तमिलनाडु की आबादी में 20 फीसदी की हिस्सेदारी करने वाले मुस्लिमों और ईसाइयों जैसे अल्पसंख्यकों का समर्थन पाने से पहले शशिकला को इन समुदायों के बीच तालमेल बनाने की जरूरत होगी।
शशिकला अब तक नेपथ्य के पीछे की खिलाड़ी रही हैं, लेकिन अब उन्हें सामने आना होगा। क्या वह बेहतर प्रशासन दे पाएंगी? तमिलनाडु में नौकरशाह और पुलिस अपनी अपनी बेहतर क्षमता के कारण आगे रहे हैं। क्या वह उनके साथ तालमेल बिठाने में सक्षम होंगी?
कानूनी लड़ाई के बाद शशिकला को नौकरशाही से बेहतर रिश्ता बनाकर रखना होगा, जिनकी राज्य में मजबूत भूमिका होती है, क्योंकि तमिलनाडु एक सीमावर्ती राज्य है। विदेश नीति के लिहाज से श्रीलंका और चीन से सुरक्षा संबंधी खतरा बहुत महत्वपूर्ण है। लिट्टे की, जो कि एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन है, तमिल सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों की आड़ में अब भी राज्य में मौजूदगी है।
अब जरा शशिकला की राजनीति के उभार की बातें करते हैं। मुख्यमंत्री का पद संभालने के लिए वह इतनी बेताब क्यों थीं? उन्हें इतनी जल्दी क्यों है? पन्नीरसेलवम को अचानक बाहर का रास्ता क्यों दिखाया गया? इन सवालों का जवाब देने से पहले बता दें कि काफी सोच-विचार के बाद शशिकला ने राज्य के सर्वोच्च पद पर कब्जा जमाने का फैसला लिया है। शशिकला का पहला काम यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके जो 20-25 निकट संबंधी हैं, वे सचिवालय के करीब न पहुंचें। उनके ये संबंधी जयललिता के निधन के दिन उनके पार्थिव शरीर के आसपास खड़े थे और यह सुनिश्चित कर रहे थे कि शशिकला बिना किसी परेशानी के पार्टी और सरकार की कमान संभाल लें। शशिकला को भ्रष्टाचार पर भी काबू पाना होगा। उनके ये रिश्तेदार गुंडागर्दी शुरू कर देंगे।
शशिकला की एक प्रमुख चुनौती आतंकवाद और उग्रवाद पर काबू पाना होगा। कुछ प्रतिबंधित संगठनों के अनियंत्रित व्यवहार जल्लीकट्टू छात्र आंदोलन के दौरान देखे गए थे। इसके अलावा मुख्य विपक्षी पार्टी द्रमुक की चुनौतियों से भी शशिकला को सामना करना पड़ेगा। करुणानिधि ने द्रमुक की कमान अपने बेटे एमके स्टालिन को सौंप दी है, इसलिए शशिकला को द्रमुक के युवा नेताओं की चुनौतियों का सामना करना होगा। द्रमुक को हलके में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि 234 सीटों वाले राज्य विधानसभा में 90 द्रमुक विधायक हैं।
सवाल यह भी है कि क्या शशिकला अन्नाद्रमुक में अपने प्रतिद्वंद्वियों के हमलों से बच सकेंगी। इसका जवाब तलाशना बहुत मुश्किल है, लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की सामूहिक जिम्मेदारी के साथ वह शीर्ष पद पर टिक सकती हैं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि शशिकला जयललिता की तरह करिश्माई नेता नहीं हैं। मतदाता अब भी आश्वस्त नहीं हैं कि वह बेहतर प्रशासन दे सकेंगी।
जयललिता के निधन के बाद राज्य में सोशल मीडिया काफी मुखर है। सोशल मीडिया पर शशिकला की पदोन्नति को स्वीकार नहीं किया गया है। जिन महिलाओं ने जयललिता को वोट दिया था, वे अब शशिकला पर सत्ता हथियाने का आरोप लगा रही हैं। शशिकला को महिला मतदाताओं के विरोध का भी सामना करना होगा।
कुल मिलाकर शशिकला भले मुख्यमंत्री बनने जा रही हों, लेकिन वह इस पद पर कब तक रहेंगी? तभी तक, जब तक अन्नाद्रमुक के विधायक एकजुट रहेंगे। मौजूदा तमिलनाडु विधानसभा का कार्यकाल 2021 तक है। क्या अगले चार वर्षों तक शशिकला 134 विधायकों को एकजुट रख पाएंगी? दिलचस्प बात यह है कि अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ता शशिकला के साथ नहीं हैं। इसलिए कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को आकर्षित करना उनके लिए मुश्किल होगा। जाहिर है, तमिलनाडु एक दिलचस्प राजनीतिक चरण में प्रवेश कर रहा है।