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अर्थव्यवस्था के संकुचन पर सूबेदारी नहीं, साझेदारी की जरूरत बता रहे हैं शंकर अय्यर

शंकर अय्यर
Updated Wed, 02 Sep 2020 03:39 AM IST
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निवेश (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : pixabay

भारत में अर्थव्यवस्था की स्थिति पर चर्चा हमेशा कटु रही है और इस कहानी ने अब एक वास्तविक पहलू और स्वर प्राप्त कर लिया है। हफ्ते भर से केंद्र सरकार और राज्य सरकारें नुकसान की मात्रा और मुआवजे की जिम्मेदारी पर टालमटोल कर रही हैं और ताना-बाना बुन रही हैं।



छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने दावा किया कि एक अप्रैल से राज्यों को केंद्र सरकार की ओर से एक भी पैसा नहीं दिया गया है। केंद्र ने अपनी ओर से एक कानूनी मत पेश किया, जिसमें सहकारी संघवाद के प्रचार के बीच कहा गया कि वह मुआवजा देने के लिए बाध्य नहीं है। बिहार, जहां भाजपा सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल है, के उप मुख्यमंत्री ने बताया कि यह केंद्र का 'नैतिक कर्तव्य' है।


जब यह मुद्दा जीएसटी काउंसिल की 41वीं बैठक में सामने आया, तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दैवीय कारक की अवधारणा पेश की। अर्थव्यवस्था की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि 'इस साल हम एक असाधारण स्थिति का सामना कर रहे हैं। हम एक ऐसे ईश्वरीय प्रकोप (एक्ट ऑफ गॉड) का सामना कर रहे हैं, जिसके फलस्वरूप अर्थव्यवस्था का संकुचन हो सकता है।'


इसके कुछ देर बाद ही बीमा उद्योग में प्रचलित जिम्मेदारी से बच निकलने के प्रावधान का हवाला देकर पार्टी के भीतर और बाहर उन्हें ट्रोल किया गया। सुब्रमण्यम स्वामी ने पूछा कि क्या पिछली आठ तिमाहियों की मंदी ईश्वरीय कार्रवाई थी, जबकि पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री ने बस इतना कहा कि 'भगवान इस सरकार को बचाए।'


बयानबाजी से अलग यह अवधारणा कई स्तरों पर समस्याग्रस्त है- अदृश्य की सर्व-शक्ति को मानना शुरू करने से लेकर यह दैवीय कृपा की स्वीकृति की भी समान रूप से मांग करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि जिस वायरस से महामारी फैली है, उसकी उत्पत्ति अभी स्पष्ट नहीं है।


सवाल यह है कि क्या इसकी उत्पत्ति प्रकृति की एक अनूठी घटना है या चीन अथवा कहीं अन्यत्र इसे प्रयोगशाला में तैयार किया गया है, लेकिन अब तक इसका कोई उत्तर नहीं मिला है। स्वयंसिद्ध प्रमाण वैज्ञानिक जांच को बाधित करता है और कार्य-कारण सिद्धांत के सहसंबंध को भ्रमित करता है-क्रमिक रूप से अर्थव्यवस्था में संकुचन सरकार द्वारा लगाए गए लॉकडाउन का परिणाम है।


केंद्र सरकार की अपनी स्वीकारोक्ति के अनुसार, इस वित्त वर्ष के पहले चार महीनों का केंद्र के ऊपर 1.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बकाया है और पूरे वर्ष के लिए उसे तीन लाख करोड़ रुपये से ज्यादा भुगतान करना पड़ सकता है।
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राज्यों के लिए संसाधनों की महत्ता को लेकर कोई विवाद नहीं है। भारत का प्रत्येक वर्ग किलोमीटर (जब तक कि यह केंद्र द्वारा प्रशासित नहीं है) राज्यों के प्रशासन के अधीन है। कुल सरकारी खर्च के आंकड़े इस बात को स्पष्ट करते हैं- वर्ष 2019 में, केंद्र का कुल खर्च 24.4 लाख करोड़ रुपये था, जबकि राज्यों का खर्च 35.5 लाख करोड़ रुपये था।


राज्य सरकारें महामारी के खिलाफ युद्ध की अग्रिम पंक्ति में खड़ी हैं, जो कि अर्थव्यवस्था के संरक्षण और विकास के लिए महत्वपूर्ण है। पूरे देश में बीस लाख से अधिक पद (स्वास्थ्य, पुलिस और शिक्षा विभाग में) रिक्त हैं, जो शासन को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हैं।


राज्यों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और पैरामेडिक्स के अतिरिक्त नई शिक्षा नीति, 2020 में निर्देशित आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं व पेयजल उपलब्ध कराने का काम सौंपा गया है। शासन की संरचनात्मक परिस्थिति कुशल संसाधन प्रबंधन के लिए एक नीति की मांग करती है।


वित्त मंत्रालय अपनी तिजौरी से खर्च करने या अपनी बैलेंस शीट के खिलाफ उधार लेने के प्रति अनिच्छुक है। इसने सुझाव दिया है कि राज्य बाजार से कर्ज उठाकर इस कमी को पूरी कर सकते हैं या भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उपलब्ध विशेष सुविधा के जरिये इसका एक हिस्सा ले सकते हैं। प्रस्तावित समाधान अपर्याप्त है, कहने की जरूरत नहीं। यह सुझाव राज्यों को बाजार से उधार लेने के लिए कहता है, मानो केंद्र मानता है कि राज्य जलेबी अर्थशास्त्र है।


हर समय केंद्र सरकार से परिवार का बुजुर्ग होने की अपेक्षा की जाती है और वह है भी। संविधान की प्रस्तावना की पहली पंक्ति में कहा गया है कि भारत राज्यों का एक संघ है और संविधान सभा की बहसों ने पदानुक्रम और साझा जिम्मेदारियों को स्थापित किया है। खराब ढंग से वर्णित और वाद-विवाद ने आगे के रास्ते को कठिन बहुत कठिन बना दिया है। शासन का ढांचा साझेदारी की मांग करता है, न कि सूबेदारी की-शब्दों ही नहीं, कर्म में भी।


आम तौर पर धन का प्रवाह केंद्र सरकार की तिजौरी से होता है। केंद्र के लिए उधार की लागत राज्यों से कम होती है। शासन की लागत में उच्च ब्याज लागत को जोड़ने का तर्क क्या है? मूल रूप से, केंद्र के घाटे और उधार को कम रखने का प्रयास किया जाता है। लेकिन चाहे कितना भी दिखावा कर लें, यह वास्तविकता छिपती नहीं। उधार चाहे केंद्र ले या राज्य सरकारें, यह सार्वजनिक ऋण के आंकड़े में दिखेगा ही। वास्तविकता यह है कि भारत मंदी के आठ तिमाहियों से लॉकडाउन में चला गया।


बैंकों के पुनर्पूंजीकरण, बकाये का भुगतान करने और बढ़ती सामाजिक सब्सिडी के लिए धन की आश्यकता केंद्र को ऋण और घाटे के दरवाजे पर दस्तक देने के लिए बाध्य करेगी। केंद्र के पास इसके लिए कुछ विकल्प हैं। सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और भारतीय जीवन बीमा निगम के कुछ हिस्से को एक संप्रभु कोष, भारत निवेश निगम में हस्तांतरित कर सकती है।


अंतर्निहित मूल्य को धन निधि, पेंशन फंड और एचएनआई को बॉन्ड जारी करने के लिए दिया जा सकता है, और इसे संस्थाओं की चरणबद्ध रणनीतिक बिक्री के साथ किया जा सकता है। आत्मनिर्भर भारत संसाधनों को बढ़ाने में नवाचार की मांग करता है। दैवीय प्रकोप को दूर करने के लिए मूल मंत्र के रूप में आधुनिक भारत के मंदिरों पर दस्तक क्यों नहीं दी जाती?

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