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बार-बार लिखो कितनी बार लिखो

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अभी कुछ क्लीन चिटें और कुछ राहतों की खबरें आईं, साथियों ने कहा, शर्म का विषय है। इस पर लिखना चाहिए। मैं निवेदन करना चाहता हूं कि करीब तीस बार शर्म के बारे में लिखकर मैं बोर हो गया हूं।
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एक समय ऐसा भी आया कि लगभग हर चौथे घंटे कुछ ऐसा होता था कि मैं लिखने बैठता और शर्म का किस्सा घट जाता। एक रिवाज-सा बन गया कि बोरा भर कर शर्म साथ रखो। जरा-सी खबर सुनो और दो मुट्ठी शर्म का हवाला देने बैठ जाओ।

क्या किसी भी लेखक को इतना-सा अधिकार नहीं कि वह शर्म से बच सके? खासतौर पर तब, जबकि वह निश्चित रूप से पर्याप्त शर्म-शर्म कहकर शर्म को ही घिस चुका हो?

कितनी तरह के वाक्य बना सकता है कोई? कितने शायरों से पंक्तियां उधार ले सकता है कोई? कितने मुहावरे गढ़े जा सकते हैं? हमारे यहां शर्म को स्त्री का आभूषण कहने की परंपरा थी। फिर हुआ यह कि केशव, घनानंद, बिहारी वगैरह स्त्रियों को लेकर काफी कुछ आभूषण बांट चुके, तो सल्तनत आनंद बख्शी वगैरह के हाथ में आ गई।
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शर्म ने दोहों-चौपाइयों की बाड़ें तोड़-ताड़ कर मिस वर्ल्डों या मल्लिकाओं, करीनाओं के इलाके में पनाह ली। आजकल शर्म का काम बयानों, लेखों या आरोपों में किस्म-किस्म की शक्ल में प्रकट होना भर रह गया है। आप शर्म से लाल होने की रासायनिक प्रक्रिया पर शोध करने की सोचते रह गए और यह शर्म नाम का तत्व विज्ञान से निकल कर वाणिज्य से होता हुआ कला संकाय में घुस गया।

वैसे मुझे फिर भी संतोष मिलता यदि शर्म कला संकाय में सुरक्षित रह जाती। पर उसने संकाय की कलात्मकता का स्तर भी ऊपर उठा दिया। अब हाल यह है कि शर्म आती नहीं, उसकी कला उठकर आती है। मैं देखता हूं कि मुख्यमंत्री को शर्म आ रही है। प्रधानमंत्री को शर्म आ रही है।

विपक्षी दल के नेता को शर्म आ रही है। वीआईपी लोगों के कुत्तों तक को शर्म आ रही है। सारी की सारी शर्म वाणिज्य संकाय से तैयार होकर कला संकाय में टांगें फैलाकर सीटी मारने लगी है।

मै लिखता हूं- 'उनको शर्म नहीं आती' पता चलता है कि वे तो मीलों लंबी शर्म का थान लेकर प्रस्तुत हैं। इधर आप थोड़ी-सी शर्म की उम्मीद करते हैं, वे शर्म का थोक उत्पादन करने को तैयार हैं। शर्म चाहिए, ट्रक भर ले लीजिए। फिर भी लेखक को लिखना पड़ रहा है कि 'शर्म उनको मगर नहीं आती।'

आखिर क्या वजह है कि शर्म के सार्वजनिक थोक उत्पादन के बावजूद आप लिखे जा रहे हैं- शर्म उनको मगर नहीं आती? ऐसी भी क्या मजबूरी है?

एक अफसर ने कुछ लुटने को लोकतंत्र के लिए शर्म की विषयवस्तु के रूप में प्रस्तुत किया। इसके बाद लूटने वाले भी शर्म लेकर प्रकट हुए।

उनके नेता ने कहा कि ऐसा हुआ है तो शर्म की बात है। शर्म के इस आंनदोत्सव में वे तो शर्मा -शर्मी में सार्वजनिक रूप से पड़े दिखते हैं, लेकिन लेखक पर दबाव है कि शर्म के अभाव पर लिखे।

लेखक पर यह दबाव क्यों है कि जो चीज इफरात में चल रही हो, उस चीज के भी न होने पर दुखी हो। या तो वह इफरात जाली है या लेखक के साथ ज्यादती हो रही है। टू जी, थ्री जी, ताबूत, आगस्टा, जेपीसी, सीडब्लूजी, संजय दत्त से लेकर बिजली तक पर्याप्त 'च ऽ....ऽ ...च्च.... के बावजूद लेखक को शर्म के न होने का रिकॉर्ड घिसना - टुंटुआना है।

सार्वजनिक जीवन के सारे ठेकेदार शर्म के गहने लादे खड़े हैं, मगर लेखक को लाज के भार से डूबे इन जनव्रतियों की करवा चौथ में भी खोट निकालनी है।

निश्चित रूप से मैं घोर बोर, दुखी और त्रस्त हूं। लेकिन उनके शर्म के गहनों का सोना कुछ गिलट जैसा जाली जान पड़ता है। क्या आप इस मामले में मुझसे सहमत नहीं हैं? यदि हैं तो संपूर्ण बोरियत के बावजूद शर्म के शानदार विज्ञापन के समय में भी अपनी शर्म से कैसे असंपृक्त रह सकते हैं?
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शर्म यह है कि शर्म पर हजार बार लिखना पड़ता था, अब दस हजार बार लिखना पड़ता है।
पर यही तो बात है, कि दस हजारवीं बार भी शर्म का गहना, सोना मांगता है।
अब क्या कीजिए, सोना भी इस बार कुछ गिर ही गया!
नमस्कार!
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