न्यूजरूम में मेरे सहयोगी अमान्डा ताउब ने हाल ही में इस फिल्म की स्रोत साम्रगी के तौर पर मुझे किताबों की एक सूची सौंपी, जिनमें काई बर्ड और मार्टिन जे शेरविन की अमेरिकन प्रोमेथियस, रिचर्ड रोडे की द मेकिंग ऑफ द एटोमिक बम, जॉन हरसे की हिरोशिमा और माइकल फ्रायन का एक नाटक कोपेनहेगन भी है, जो वर्ष 1941 में नाजी जर्मनी द्वारा एटम बम की खोज की पृष्ठभूमि में जर्मन भौतिक विज्ञानी वॉर्नर हेजेनबर्ग द्वारा डेनमार्क के विज्ञानी नाइल्स बोर से मुलाकात पर है।
हालांकि कुछ दूसरे लोगों ने मुझे रॉय मांक द्वारा लिखी ओपेनहाइमर की जीवनी पढ़ने से लेकर 20वीं सदी की शुरुआत के समय भौतिकी की स्थिति और अमेरिका द्वारा परमाणु बम के इस्तेमाल से संबंधित उस समय की अंतहीन बहसों को पढ़ने-जानने की सलाह दी है। लेकिन मेरे पास एक व्यक्ति के बारे में पढ़ने का वैकल्पिक सुझाव भी है, नेपथ्य से जिनकी निरंतर घृणा से ही ओपेनहाइमर जैसा एक किरदार सामने आया। नहीं, वह हिटलर नहीं थे, जिनके बारे में कहा जाता है कि परमाणु बम की खोज उन्हीं के विरुद्ध मोर्चेबंदी से हुई। वह व्यक्ति दरअसल जोसेफ स्टालिन थे, जिनके पास मैनहटन परियोजना पर खुफिया नजर रखने वाले जासूस थे, और जिन्होंने जल्दी ही अपना एटम बम हासिल कर लिया था।
स्टालिन से संबंधित इस किताब का नाम स्टालिन'स वॉर : ए न्यू हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड वॉर 2 है, जिसके लेखक हैं सीन मैक्मीकिंग। पुस्तक बताती है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के संदर्भ में हम स्टालिन पर ज्यादा ध्यान गड़ाएं, हिटलर से ज्यादा उन पर फोकस करें, क्योंकि युद्ध की आग भड़काने, उकसाने, चीजों और स्थितियों को चालाकी से अपने पक्ष में नियंत्रित करने में स्टालिन की भूमिका ज्यादा बड़ी थी।
ओपेनहाइमर फिल्म देखने के बाद मैक्मीकिंग की यह किताब पढ़ने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि यह पुस्तक फिल्म के आखिरी और निर्णायक क्षणों का औचित्य साबित करती है, जहां तत्कालीन राजनीतिक जटिलता के माहौल में कम्युनिज्म विरोधी रुख हावी दिखता है। परमाणु बम बना लेने के बाद फिल्म में ओपेनहाइमर परमाणु हथियारों की होड़ रोकने की कोशिश करते हैं और इस प्रक्रिया में शीतयुद्ध को प्रोत्साहित करने वाले लोगों से टकराते हैं। फिर राजनीतिक और व्यक्तिगत क्षोभ के वशीभूत होकर एक शीतयोद्धा लेविस स्ट्रॉस एक अदालत में शिकायत कर ओपेनहाइमर को मिली सुरक्षा अनुमति की सुविधा पलट देता है।
मेरे कुछ रूढ़िवादी दोस्त हैं, जो क्रिस्टोफर नोलन की टोरी छवि से इत्तफाक रखते हैं। उन दोस्तों की राय यह है कि खासकर इस विवाद में यह फिल्म ओपेनहाइमर के पक्ष में खड़ी नहीं दिखती। फिर वे ओपेनहाइमर के फैसलों और स्ट्रॉस के तर्कों को सामने रखकर बताते हैं कि ओपेनहाइमर सचमुच में शेखीबाज, राजनीतिक रूप से नादान और इतने लापरवाह थे कि उन्हें अपनी बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना में कम्युनिस्टों की घुसपैठ के बारे में पता ही नहीं चल पाया। हालांकि, मोटे तौर पर देखें, तो जैसा कि ओपेनहाइमर की जीवनी के सह-लेखक बर्ड लिखते हैं, 'ओपेनहाइमर फिल्म अपने अंत तक सभी जटिलताओं को हटाते हुए एक ऐसे निर्दोष प्रतिभावान शख्स की शहादत की दास्तान ज्यादा बन जाती है, जो कई मामलों में अनभिज्ञ, कम बौद्धिक, अनजान लोगों से भयभीत होने वाला व्यक्ति था, और जिसे गलत ढंग से फंसा दिया गया था।'
स्टालिन'स वॉर किताब के अनुसार, स्टालिन उतने ही बड़े शिकारी थे, जितने कि हिटलर। उन्होंने भी 1939 और 40 में नाजियों के समान देशों पर हमला किया। उन्होंने भी तटस्थता की आड़ में अपने क्रूर साम्राज्य को आकार दिया और पश्चिमी लोकतंत्रों के खिलाफ फासीवाद को प्रोत्साहन दिया। मैक्मीकिंग की किताब बताती है कि स्टालिन भी नाजी जर्मनी पर हमला करने की तैयारी कर रहे थे, जब हिटलर ने उस पर हमला किया। दोनों तानाशाह दरअसल इस होड़ में थे कि कौन एक-दूसरे को धोखा देने के लिए पहले लामबंदी करेगा। हालांकि हिटलर के खिलाफ स्टालिन के साथ जुड़ने और उसी समय कम्युनिस्टों से संबंध रखने वाले वैज्ञानिकों के समूह को तैयार करने की कार्रवाई कम समय में परमाणु हथियार तैयार करने की जरूरत की वजह से थी, तो तत्कालीन वैश्विक हालात पर भी ध्यान देना होगा, जब जर्मनी और जापान की हार बिल्कुल तय लग रही थी।
खैर, इससे यह बिल्कुल साबित नहीं होता कि ओपेनहाइमर नामक व्यक्ति के साथ जो हुआ, वह उचित था। उनके साथ जो भी हुआ, उसकी वजहें महज मूर्खता या विदेशी संस्कृति से घृणा नहीं मानी जा सकती। ऐसे में, ओपनहाइमर फिल्म के दर्शकों की समझदारी इसमें होगी कि वे एक जटिल नायक की उलझी हुई किस्मत को देखते वक्त स्टालिन की दुर्भावनाओं के अलावा जीतों और साजिशों में उसे जिस कदर कामयाबी मिली, उसको जरूर अपने जेहन में रखें।