ऐसे वक्त में, जब त्योहारों की वजह से बिजली की मांग आने वाले दिनों में और बढ़ने वाली है, देश के करीब 40 फीसदी कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों में ईंधन के भंडार में भारी कमी होना ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से एक गंभीर चेतावनी है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर के मध्य तक देश के 190 ताप विद्युत संयंत्रों में से 74 में कोयले का भंडार निर्धारित मानक के 25 फीसदी से भी नीचे पहुंच गया था।
कई संयंत्रों के पास तो तीन दिन से भी कम समय का ईंधन बचा था। बताया जा रहा है कि कोल इंडिया की खदानों में कोयला मौजूद था, लेकिन उसे बिजली संयंत्रों तक पहुंचाने में परिवहन संबंधी अड़चनें सामने आईं। मानसून के दौरान कोयला उत्पादक क्षेत्रों में भारी बारिश से खनन और ढुलाई प्रभावित हुई, जबकि अल-नीनो से जुड़ी गर्म परिस्थितियों के चलते बिजली की मांग बढ़ने पर ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले की खपत भी तेज हुई।
इससे संकेत मिलता है कि समस्या केवल उत्पादन की कमी से नहीं, बल्कि खदानों से संयंत्रों तक कोयला पहुंचाने वाली पूरी आपूर्ति शृंखला की क्षमता से जुड़ी है। फिर भी, किसी एक वजह को निर्णायक मानने के बजाय खनन, परिवहन, भंडारण और मांग, इन सभी पहलुओं का संयुक्त आकलन करना जरूरी होगा। उल्लेखनीय है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा में कोयले की अहम भूमिका इस स्थिति को अधिक जोखिमपूर्ण बनाती है।
अक्षय ऊर्जा क्षमता में वृद्धि के बावजूद, सौर व पवन ऊर्जा का उत्पादन मौसम व समय पर निर्भर रहता है। बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण की क्षमता अभी पर्याप्त विकसित नहीं हुई है। इसलिए, मांग बढ़ने या अक्षय ऊर्जा उत्पादन घटने की स्थिति में ताप विद्युत संयंत्रों पर निर्भरता बढ़ना स्वाभाविक है। ऐसे में, अगर इन संयंत्रों के पास पर्याप्त कोयला न हो, तो बिजली उत्पादन प्रभावित होने की आशंका रहती है।
आर्थिक गतिविधियों के विस्तार, शहरीकरण तथा एयर कंडीशनर इत्यादि के बढ़ते इस्तेमाल से आने वाले वर्षों में बिजली की खपत बढ़ने की संभावना है। मांग में यह वृद्धि अपने आप में संकट का कारण नहीं है, लेकिन अगर उत्पादन और ईंधन आपूर्ति की योजना उसके अनुरूप न हो, तो व्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है।
ऐसे में, यह जरूरी है कि परिवहन ढांचे, बफर स्टॉक, मांग के पूर्वानुमान और ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण पर समानांतर ढंग से काम किया जाए। साथ ही, जिन संयंत्रों में भंडार बार-बार न्यूनतम स्तर तक पहुंचता हो, वहां केवल अतिरिक्त कोयला भेजने के बजाय आपूर्ति योजना, भंडारण क्षमता और परिवहन व्यवस्था की अलग से समीक्षा भी की जाए। बिजली की बढ़ती जरूरतों के दौर में किसी एक पहलू को भी नजरअंदाज करना भूल साबित हो सकता है।