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विज्ञान: देश के वैज्ञानिकों को सितारा बनाने की जरूरत, वैश्विक प्रयोगों की केंद्रीय शक्ति बनना चाहता है भारत

सार

भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र और वैश्विक प्रयोगों की केंद्रीय शक्ति बनना चाहता है। इसके लिए देश के वैज्ञानिकों को सितारा बनाने की भी जरूरत है।
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वैज्ञानिक (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-ग्राफिक्स
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विस्तार
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चीन के शहरों में पहले जिन विशाल होर्डिंगों और डिजिटल स्क्रीनों पर आम तौर पर फिल्मी सितारे, फैशन मॉडल और महंगे ब्रांड दिखाई देते थे, वहां अब चीनी वैज्ञानिकों के चेहरे दिखाई दे रहे हैं। अगस्त में चीन के शहर शॉनडोंग में शुरू हुई यह पहल दूसरे इलाकों तक पहुंची और वैज्ञानिकों के पोस्टर रेलवे स्टेशनों, मॉल और शहरों के प्रमुख स्थानों पर दिखाई देने लगे। कहीं यह संदेश भी लिखा गया कि वास्तव में यही वे ‘टॉप स्टार’ हैं, जिनका अनुसरण किया जाना चाहिए। क्या भारत में ऐसा नहीं किया जा सकता?

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चंद्रयान जब चंद्रमा पर उतरता है, तो पूरा देश उत्सव मनाता है। लेकिन, कितने भारतीय परिवार उन वैज्ञानिकों के नाम जानते हैं, जिन्होंने इन अभियानों की प्रणालियां विकसित कीं? वैज्ञानिक प्रायः सार्वजनिक स्मृति में तभी आते हैं, जब कोई बड़ा मिशन सफल होता है या उन्हें कोई बड़ा पुरस्कार मिलता है। प्रतिष्ठा किसी भी पेशे का पारिश्रमिक होती है। प्रतिभाशाली युवा कॅरिअर चुनते समय वेतन और सुविधाओं के साथ यह भी देखते हैं कि समाज ने किस पेशे को कितनी मान्यता दी है। इसलिए वैज्ञानिकों और तकनीकी कर्मचारियों के इसरो छोड़ने की हालिया खबरों को केवल मानव संसाधन की सामान्य घटना मानकर छोड़ देना ठीक नहीं होगा।

इसरो की महत्वपूर्ण परियोजनाओं से जुड़े वैज्ञानिकों व तकनीकी कर्मचारियों के इसरो छोड़ने के मामलों के बाद संगठन से इस्तीफा देने के मामलों की समीक्षा की कड़ी व्यवस्था की गई थी। निजी अंतरिक्ष कंपनियों का विस्तार अनुभवी वैज्ञानिकों के लिए अधिक वेतन और नए अवसर भी पैदा कर रहा है। जब नौ कर्मचारी संगठनों ने इसरो से उसकी भूमिका स्पष्ट करने की मांग की, तो इसरो ने स्पष्ट किया कि न तो उसका निजीकरण किया जा रहा है और न ही उसकी भूमिका कम की जाएगी।
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2020 के सुधारों और भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 के बाद निजी क्षेत्र के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र के दरवाजे खुले हैं। इसके परिणामस्वरूप आज देश में 450 से अधिक अंतरिक्ष स्टार्टअप्स सक्रिय हैं। इस बदलाव में अवसर भी हैं और चेतावनी भी। इसलिए, वैज्ञानिकों को रोकने का उपाय उनके इस्तीफा की प्रक्रिया को कठिन बनाना नहीं, बल्कि उनके लिए अवसरों को आकर्षक बनाना होना चाहिए।

विज्ञान को ‘लोकप्रिय’ बनाने से पहले उसके संसाधनों की व्यवस्था भी मजबूत बनानी होगी। प्रतिभा पलायन की कहानी भी इसी से जुड़ती है। सरकार कई योजनाओं के माध्यम से विदेशों में कार्यरत भारतीय वैज्ञानिकों को वापस बुलाने का प्रयास कर रही है। लेकिन, नेचर पत्रिका ने वैज्ञानिकों के हवाले से कहा है कि केवल आकर्षक फेलोशिप ही काफी नहीं है, शोध ढांचा, दीर्घकालिक आय सुरक्षा और कॅरिअर के अवसर भी निर्णायक होते हैं। भारतीय शोधकर्ताओं पर हुए एक सर्वेक्षण में 70 फीसदी उत्तरदाताओं ने अनुदान और फंडिंग व्यवस्था से असंतोष जताया और 85 फीसदी ने बेहतर प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जरूरत बताई। उन्होंने यह भी बताया कि नियुक्ति प्रक्रिया में भी महीनों लग सकते हैं। इसलिए ब्रेन ड्रेन का उत्तर केवल राष्ट्रवादी अपील नहीं हो सकता।

हमारा देश वैज्ञानिकों का सम्मान बिल्कुल नहीं करता, ऐसा कहना भी अनुचित होगा। राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार व्यवस्था को पुनर्गठित कर राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार शुरू किए गए हैं। इनके घोषित उद्देश्यों में वैज्ञानिकों की उपलब्धियों को समाज के लिए प्रेरक बनाना भी शामिल है। समस्या सम्मान की अनुपस्थिति से अधिक उसकी सार्वजनिक दृश्यता की है। यहीं चीन के होर्डिंग भारत के लिए उपयोगी संकेत देते हैं।

कल्पना कीजिए कि सार्वजनिक स्थानों पर केवल मोबाइल फोन, कारों, फिल्मों और सौंदर्य प्रसाधनों के विज्ञापन न हों, बल्कि भारतीय वैज्ञानिक भी दिखाई दें, तो कैसा लगेगा? उनके चित्रों-विजुअल्स के नीचे सिर्फ एक कहानी हो कि उन्होंने आपके जीवन को कैसे बदला। स्कूलों और कॉलेजों में ‘सेलिब्रिटी विजिट’ की अवधारणा का विस्तार वैज्ञानिकों तक किया जा सकता है। वैज्ञानिकों को नायक बनाने का अर्थ उनका व्यक्ति पूजन नहीं, बल्कि जिज्ञासा, प्रमाण, प्रयोग, असफलता और खोज को प्रतिष्ठा देना है। विज्ञान में असफल प्रयोग भी ज्ञान पैदा करते हैं।

भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र और वैश्विक प्रयोगों की केंद्रीय शक्ति बनना चाहता है। इसके लिए प्रयोगशालाएं, बजट और स्टार्टअप और नीतियां महत्वपूर्ण हैं, पर उतना ही जरूरी सांस्कृतिक परिवर्तन भी है। भारत को विज्ञान में केवल विशेष शक्ति बनाने की नहीं, वैज्ञानिक को सामाजिक सितारा बनाने की भी जरूरत है।

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