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फैसला और संदेश: दिल्ली दंगों पर अदालत की दो टूक, देश विरोधी मामलों में कोई रियायत नहीं

अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: लव गौर Updated Tue, 06 Jan 2026 08:03 AM IST

सार

दिल्ली दंगों की साजिश रचने से जुड़े मामले में दो मुख्य आरोपियों की जमानत की अर्जी ठुकराते हुए पांच अन्य आरोपियों को सशर्त जमानत देकर शीर्ष अदालत ने आरोपों की गंभीरता को स्पष्ट करने के साथ यह कड़ा संदेश भी दिया है कि देश विरोधी मामलों में किसी भी तरह की रियायत नहीं बरती जाएगी।
 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : पीटीआई


चूंकि, इन दोनों को दोबारा जमानत की अर्जी दायर करने के मामले में अदालत ने गवाहों की जांच पूरी हो जाने या फिर अधिकतम एक साल की शर्त रखी है, इससे साफ है कि दोनों को जल्दी राहत नहीं मिलने वाली है। पांच आरोपियों को बेशक सशर्त जमानत दी गई है, लेकिन उन पर लगाए गए आरोपों में कोई नरमी नहीं दिखाई गई, बल्कि कहा गया है कि अगर इन शर्तों का उल्लंघन होता है, तो ट्रायल कोर्ट जमानत रद्द करने के लिए स्वतंत्र होगा। गौरतलब है कि इन सातों आरोपियों के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने दिल्ली दंगों के संदर्भ में यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया था, जिसमें बड़े पैमाने पर फैली हिंसा में 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।


हालांकि, बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपियों को लंबे समय से जेल में कैद रखा गया है, पर अदालत ने स्पष्ट किया कि यह जमानत का आधार नहीं हो सकता, क्योंकि ‘कथित अपराधों में इन दोनों की भूमिका केंद्रीय रही है। इन दोनों की हिरासत की अवधि भले ही लंबी रही हो, पर यह न तो सांविधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करती है और न ही संबंधित कानूनों के तहत लगे वैधानिक प्रतिबंधों को निष्प्रभावी करती है।’ अभियोजन पक्ष ने अदालत में जो सबूत पेश किए हैं, उससे प्रथमदृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि दिल्ली दंगा स्वतःस्फूर्त नहीं भड़का था, बल्कि यह ऐसे समय में देश की संप्रभुता पर सुनियोजित हमला था, जब दूसरे देश के एक विशिष्ट अतिथि भारत दौरे पर थे।


जाहिर है, यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को बदनाम करने तथा देश में सांप्रदायिक विभाजन पैदा करने की भी सोची-समझी कोशिश थी, जिसके लिए न सिर्फ भड़काऊ भाषण दिए गए, बल्कि व्हाट्सएप से संदेश भी प्रसारित किए गए। बेशक यह हिंसा सीएए और एनआरसी के खिलाफ चल रहे आंदोलनों के समय भड़की, लेकिन क्या इसका उद्देश्य विरोध से कहीं ज्यादा देश भर में आंतरिक अस्थिरता पैदा करना नहीं था? जाहिर है, शीर्ष अदालत ने मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए अपने सुविचारित फैसले के जरिये कड़ा संदेश दिया है कि देश विरोधी मामलों में किसी भी तरह की रियायत नहीं बरती जाएगी और उससे सख्ती से निपटा जाएगा।
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