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अपने-अपने हाथ

Wed, 30 Apr 2014 07:08 PM IST
अशोक सण्ड
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चुनावी इश्तिहार साक्षी हैं कि वोटरों का ध्यान खींचने के लिए इस चुनाव में भी हाथ को पर्याप्त महत्व मिला। मानव शरीर रचना में हाथ को विशेष दर्जा हासिल है। शिष्टाचार में हाथ मिलाए जाते हैं। अभिवादन में हाथ हिलाए जाते हैं। वहीं मनमुटाव की बेला में हाथ खींच भी लिए जाते हैं। नौबत हाथापाई तक आ जाती है। हाथ मजबूत करने का विनय एक सुदीर्घ परंपरा है। एक संस्कार भी होता है पाणिग्रहण। कभी हाथ को तरजीह देकर प्रमुख विपक्ष पार्टी, जो इस मर्तबा पक्ष में बैठने की ताल ठोंके है, चुनाव लड़ा था। उसका दावा था, हर हाथ को काम, हर खेत को पानी। संप्रति देश के सबसे पुराने एक खास ‘घराने’ द्वारा संचालित पार्टी अपनी मजबूती के लिए हर हाथ शक्ति, हर हाथ तरक्की का आश्वासन देती नजर आई।
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काफी पावरफुल पोजीशन होती है हाथ की। बिना हाथ वाला निहत्था। न्याय मिलने में भले विलंब हो, लेकिन मान्यता है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं। गब्बर चाहता, तो ठाकुर की टांग तोड़कर उसे लंगड़ा बना सकता था। लेकिन वह समझदार था। ‘विनयावनत’ होकर उसने कहा था, ये हाथ हमें दे दो ठाकुर।

कहते हैं कि हाथ की सभी उंगलियां बराबर नहीं होतीं। अब भैया, गौर करो तो (माल) खाते समय सब बराबर हो जाती हैं। तरक्की भी वही करते हैं, जिनके हाथों की पांचों उंगलियां घी में होती हैं। संतोष की बात है कि देश के मौजूदा हालात के लिए किसी ‘विदेशी हाथ’ का डंका नहीं पीटा गया। जिनके कारनामो का हाथ है, वे जग-जाहिर हैं. ‘सर्वदुर्गुण संपन्न आत्माएं’ अपनों के हाथ मजबूत करती रहीं। जुबान ‘मौन’ रही। चली, तो बेतरतीब चली। सात चरणों के चुनाव संपन्न होते ही कुछ अति आशावादी आत्माएं दुख भरे दिन बीते रे भैया...की आस में। उधर एक दशक से हुकूमत चलाने वालों की मानसिकता क्या से क्या हो गया सरीखी। समझदार भले हो गया हो मतदाता, लेकिन वोट डालने के बाद अगले चुनाव तक ‘हाथ पर हाथ रख के बैठना’ ही उसकी नियति है। यही तो ट्रेजेडी है डेमोक्रेसी की।
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