साधो, किसी दुकान पर यह लिखा हो कि 'यहां किराये पर प्रेमी मिलते हैं’, तो आप हैरत में पड़ जाएंगे। पहले मकान, हवाई जहाज, दूल्हे की पगड़ियां किराये पर मिला करती थीं। एक पगड़ी कई-कई कुंवारों के सिरों पर शोभायमान होकर अपनी कीमत से ज्यादा लाभ दुकानदार को देकर हर बार गैरशादीशुदा बनी रहती है। जमाना ऐसा बदला कि किराये की कोख और रूदालियां भी मिलने लगीं। लेकिन इधर चीन की एक वेबसाइट पर किराये के प्रेमी मिलने की खबर जब से मिली है, तब से मैं फूला नहीं समा रहा हूं।
रिश्तेदारी या परिचितों में मिलने जाना है और आप अकेले हैं, तो कोई हर्ज नहीं। चीन के हकीम-लुकमानों ने इसकी भी दवा ईजाद कर ली है। किसी दूसरे शहर में प्रेमी को साथ लेकर जाने के लिए प्रतिदिन 880 युआन का भुगतान करना होगा। खरीदारी में प्रेमी का साथ चाहिए, तो उसकी कीमत है प्रति घंटा 150 युआन।
मान लो, किसी ने खरीदारी के मकसद से एक प्रेमी को घंटे भर के लिए किराये पर लिया। प्रेमी चीजों के चयन में उसकी मदद कर रहा है। उसकी पसंद और नापसंद का ख्याल रख रहा है। बता रहा है कि कोई कपड़ा शरीर पर कितना फब रहा है या चुस्त ड्रेस और ढीली पोशाक में आपके लिए क्या अनुकूल है। दिक्कत यह है कि यदि खरीदारी में आधा घंटा अधिक लग गया, तो प्रेमी को उस अतिरिक्त समय का भुगतान करना पड़ेगा। प्रेमी किराये के बदले आपसे प्रेम का इजहार करेगा। जितनी अधिक कीमत आप उसे देंगी, वह उतना वक्त बिताएगा। वह प्रदर्शित करेगा कि वह वास्तविक प्रेमी है, किराये का नहीं।
एक कवि मित्र ने मुझसे कहा कि बाजार ने तो बहुत अच्छी सुविधा प्रदान कर दी है, पर यदि इस प्रेमी पर कविता लिखनी होगी, तब संकट की स्थिति होगी। मैंने कहा, क्या जरूरी है कि अब प्रेमियों पर कविताएं रची ही जाएं। इस माथापच्ची का कोई अर्थ नहीं कि मनुष्य बाजार के लिए है या बाजार मनुष्य के लिए। बस आप खुली आंखों से बाजार का नजारा लीजिए और किराये के प्रेमी के साथ एक नपी-तुली मुस्कराहट से अपना काम चलाइए।