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अखबार में ही ताजमहल देखना

Thu, 03 Jul 2014 07:28 PM IST
प्रकाश पुरोहित
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जब भी कोई विदेशी नेता पत्नी के साथ भारत आता है, तो मुझे पक्का भरोसा रहता है कि वह ताजमहल के सामने वाली बेंच पर बैठकर तस्वीर जरूर खिंचवाएगा। कई बार तो यह भी लगता है कि ये विदेशी दंपति ताजमहल देखने नहीं, उस बेंच पर बैठकर फोटो खिंचवाने आते हैं। ये दंपति एक तरह से ताजमहल के ब्रांड एंबेसडर होते हैं, जो हम जैसे पति-पत्नी को उकसाते हैं कि अब तक यहां बैठकर फोटो भी नहीं खिंचवाया...यानी मानुष जनम गंवाया।
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हमारे यहां के लोग ताजमहल देखने जाते हैं, तो उनके चित्र उस बेंच पर बैठे नजर नहीं आते। वे न जाने कहां भटकते रहते हैं और क्या देखते रहते हैं। तब यह भी लगता है कि विदेशियों के लिए वह बेंच कहीं अलग से लाकर तो नहीं रख दी जाती है, ताकि आम आदमी वहां बैठकर फोटो न खिंचवा ले! ताजमहल के न जाने कितने चित्र देखे हैं मैंने, मगर बगैर विदेशी दंपती के बैकग्राउंड में वह बेंच कहीं नजर नहीं आती।

पत्नी जब भी उस बेंच पर किसी दंपति को बैठे देखती है, तो मुझे उलाहना देने लगती है कि देखो, इनकी शादी को तीन साल ही हुए हैं और ये ताजमहल देख आए। जबकि हमारी शादी को तीस साल हो गए, हम अखबार में ही ताजमहल देख रहे हैं। मुझे यह समझ में नहीं आता कि उसकी जिद ताजमहल देखने की है या उस बेंच पर बैठकर फोटो खिंचवाने की। अभी दो दिन पहले ही ऐसे दंपति के फोटो छपे थे, जिनकी शादी को पचास साल हो गए हैं। पत्नी ने जब फिर मुझे ताना मारा, तब मैंने उसे यही समझाया कि अभी तो हमारे पास बीस साल और पड़े हैं। न ताजमहल कहीं भागा जा रहा है, न ही फोटो वाली वह बेंच।
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यही वजह है कि जब भी कोई विदेशी नेता पत्नी के साथ भारत आता है, तो मेरे घर में अखबार कम-से-कम तीन दिन तक तो मिलता ही नहीं है और मिल भी जाता है, तो उसका एकाध पन्ना कम होता है। यही तो कर सकता हूं मैं। ताजमहल देखने की मेरी भी इच्छा है, मगर अपना पैसा खर्च कर जाने में क्या तुक है। ये सारे विदेशी नेता क्या ताजमहल देखने का खर्च अपनी जेब से अदा करते हैं!
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