कविता
नन्ही गौरेया सी खुद को दीखती हूं मैं
बरसों पहले गांव के सौ नाते
मैं भूल आई थी।
बरसों तक जिन पर उपेक्षा की धूल,
मैंने खुद बिछाई थी,
इस बड़े शहर में,
खोई हुई पहचान के संग
खोजती हूं मैं।
मरकरी रोशनी की सुन्न सरहदों में
गंवई चांदनी की चादरें क्यों चाहती हूं मैं?
इस शहर के बुझे-बुझे से अलावों में,
ऊष्मा अंगार की ढूंढती हूं मैं।
भीड़ के रेलों में ठुंस-ठुंस कर भी
सबके सब चेहरे अपरिचित देखती हूं मैं।
इस शहर की आधुनिक बूढ़ियों में
मां का झुर्रियों वाला
चेहरा सलौना ढूंढती हूं मैं।
अविराम से इस शहर के,
तेज कदमों के तले से
नीम की छाया तले के
विश्राम वाले कुछ पहर खींचती हूं मैं।
ज्ञान के भंडार से इस शहर में,
गांव की ड्योढ़ी से छिटके
कुछ निरक्षर से अक्षर
खूब चीन्हती हूं मैं।
तरुण तालों के बदन पर थरथराती लड़कियों में
पोखरों की बत्तखें देखती हूं मैं।
सुनहरे बाज के सख्त पंजों में फंसी
नन्ही गौरेया सी खुद को दीखती हूं मैं।
आसमानों ने दिए कब पंछियों को आसरे
उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर
चलूं अपनी धरतियों से
अब गले मिलती हूं मैं।
-निर्देश निधि
निधि के शब्दों में आप आज की जिंदगी का पता ढूंढ सकते हैं। बुलंदशहर में रहती हैं।