एटनबरो का जीवन न केवल प्राकृतिक दुनिया के बारे में मानवता की बढ़ती वैज्ञानिक समझ के साथ, बल्कि इसके तेजी से हो रहे नुकसान के साथ भी गहराई से जुड़ा रहा है। उनकी शुरुआती और बेहद अहम बीबीसी सीरीज लाइफ ऑन अर्थ: अ नेचुरल हिस्ट्री (1979) ने वह कर दिखाया, जो बहुत कम अकादमिक किताबें कर पाई हैं। इसने विकासवादी जीव विज्ञान की जटिलताओं को आम लोगों के लिए सुलभ बना दिया। उनके काम का मुख्य आधार वैज्ञानिक सटीकता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता रही है। विज्ञान और कहानी कहने (किस्सागोई) के बीच का यह रिश्ता बहुत अहम रहा है, क्योंकि एटनबरो का 'रोजमर्रा' वाला तरीका यह दिखाता है कि दर्शक ऐसी चीजों से भी जुड़ सकते हैं, जिन्हें अक्सर सिर्फ ज्यादा पढ़े-लिखे और वैज्ञानिक समझ रखने वाले दर्शकों के लिए मान लिया जाता है। उनकी शुरुआती डॉक्यूमेंट्री में चीजों की भरमार और खोज का एहसास होता था। समय के साथ, जैसे-जैसे जैवविविधता के नुकसान और जलवायु परिवर्तन के वैज्ञानिक प्रमाण बढ़ते गए, उनका काम भी उसी के अनुसार बदलता गया। हाल में, उनकी डॉक्यूमेंट्रीज में मानवीय असर, आवासों के विनाश और विलुप्त होने के जोखिम पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा है। एटनबरो ने प्राकृतिक दुनिया के प्रति विस्मय, जिज्ञासा और सहानुभूति को बढ़ावा देकर, संरक्षण नीतियों और कार्यों के लिए आवश्यक जन-माहौल बनाने में मदद की है। उनके प्रभाव को वैज्ञानिकों, संरक्षणवादियों और शिक्षकों की उन पीढ़ियों में देखा जा सकता है, जो उनके कार्यक्रमों को अपने जीवन के निर्माणकारी अनुभवों के रूप में याद करते हैं। उन्होंने यह समझने में मदद की है कि जीवन का विकास कैसे हुआ, और इसकी रक्षा क्यों करनी चाहिए। पारिस्थितिक संकट के दौर में उनका काम हमें याद दिलाता है कि वैज्ञानिक ज्ञान तब सबसे अधिक शक्तिशाली होता है, जब वह लोगों को जीवित दुनिया से इतनी मजबूती से जोड़ता है कि हम इसकी रक्षा करने के लिए परवाह करने को विवश हो जाएं।
सर डेविड एटनबरो का तर्क था कि उन कार्यक्रमों से दूर हटना 'जरूरी' है, जो केवल प्रकृति की सुंदरता दिखाते हैं, और इसके बजाय दर्शकों को 'जंतु विज्ञान के नए रुझानों और विचारों की गंभीरता और आलोचनात्मक नजर से जांच करने' के लिए प्रेरित करना चाहिए।
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के विज्ञान और प्रौद्योगिकी अध्ययन विभाग में विज्ञान संचार के प्रोफेसर, जीन-बैप्टिस्ट गुयोन एटनबरो के प्रभाव के बारे में बताते हैं कि 1950 के दशक की शुरुआत में, जब एटनबरो बीबीसी में शामिल हुए, तब प्राकृतिक इतिहास पर आधारित टेलीविजन को एक खास तरह की शैली माना जाता था। इसका मकसद शौकिया प्रकृति प्रेमियों को प्रकृति की सुंदरता और उससे मिलने वाले भावनात्मक आनंद को साझा करने का मौका देना था। 1980 के दशक तक, उन्होंने इसे टीवी प्रोग्रामिंग की सबसे लोकप्रिय शैलियों में से एक और विज्ञान के प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम बनाने में मदद की। उनका यह प्रभाव उनके बाद के कामों में भी जारी रहा, जिनमें प्लैनेट अर्थ II, बल्यू प्लैनेट II और ऑवर प्लैनेट शामिल हैं। 26 साल की उम्र में, उन्हें द कोइलाकेंथ (1953) के प्रोड्यूसर के तौर पर पहला श्रेय मिला। वैज्ञानिक विचार को बताने के लिए वन्यजीव कार्यक्रम का यह इस्तेमाल उनकी पहचान बन गया। जू क्वेस्ट सीरीज (1954) के साथ, एटनबरो ने वाइल्डलाइफ टेलीविजन को एक नया रूप देना शुरू किया। इन कार्यक्रमों के लिए वह लंदन चिड़ियाघर के कर्मचारियों के साथ मिलकर जानवरों को इकट्ठा करने के लिए दूर-दराज की अनोखी जगहों पर गए। नायक, निर्माता, कथावाचक और प्रस्तुतकर्ता—ये सभी भूमिकाएं निभाकर एटनबरो केंद्रीय कलाकार बन गए। उसके बाद से, एटनबरो के सहज ऑन-स्क्रीन प्रदर्शनों ने उन्हें खूब सराहना दिलाई। उन्होंने बहुत बारीकी से स्क्रिप्ट तैयार करने में काफी मेहनत की, जिसमें उन्होंने किसी भी चीज को किस्मत के भरोसे नहीं छोड़ा। हालांकि 1960 के दशक की शुरुआत तक, उनका लाइव टेलीविजन से लगभग विश्वास उठ चुका था। उनका तर्क था कि उन कार्यक्रमों से दूर हटना 'जरूरी' है, जो केवल प्रकृति की सुंदरता दिखाते हैं, बल्कि इसके बजाय दर्शकों को 'जंतु विज्ञान के नए रुझानों और विचारों की गंभीरता और आलोचनात्मक नजर से जांच करने' के लिए प्रेरित करना चाहिए। एक दशक बाद, जब वह फिर से खुद कार्यक्रम बनाने लगे, तो उन्होंने अपनी महान कृति, लाइफ ऑन अर्थ (1979) में इसी सोच को साकार किया।
विज्ञान और कहानी कहने (किस्सागोई) के बीच का यह रिश्ता बहुत अहम रहा है, क्योंकि एटनबरो का 'रोजमर्रा' वाला तरीका यह दिखाता है कि दर्शक ऐसी चीजों से भी जुड़ सकते हैं, जिन्हें अक्सर सिर्फ ज्यादा पढ़े-लिखे और वैज्ञानिक समझ रखने वाले दर्शकों के लिए मान लिया जाता है।
जलवायु संचार और जन-भागीदारी पर शोध करने वाली सैफ्रन ओ'नील बताती हैं एटनबरो ने दुनिया भर में जलवायु संचार की तकनीकों को आकार दिया है। वह जलवायु परिवर्तन पर उन चुनिंदा आवाजों में से एक हैं, जिन्हें लगभग हर कोई सुनने को तैयार रहता है। सात दशकों से भी ज्यादा समय में, उनके काम ने वैज्ञानिक ज्ञान को संप्रेषित करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है; उन्होंने प्रसारण के क्षेत्र में हुई प्रगति को सशक्त कहानी कहने की कला के साथ जोड़ा है।
समय आ गया है कि उनके इस संदेश को सुना जाए
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की जलवायु वैज्ञानिक क्लोई ब्रिमिकोम्ब कहती हैं कि भले ही एटनबरो ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर देर से अपनी बात रखी, लेकिन हाल के वर्षों में वह इसके एक प्रबल समर्थक बन गए हैं। अब समय आ गया है कि उनके इस संदेश को सुना जाए और उस पर अमल किया जाए, ताकि दुनिया की प्राकृतिक विविधता कई पीढ़ियों तक सुरक्षित रहे।
-साथ में, जीन-बैप्टिस्ट गुयोन, सैफ्रन ओ'नील एवं क्लोई ब्रिमिकोम्ब।