पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण इतना मजबूत है कि यह हमारी धरती के काफी दूर-दूर तक फैला हुआ है। इसलिए अंतरिक्ष में जाने वाले रॉकेट को पृथ्वी की कक्षा को छोड़ना काफी मुश्किल होता है। निश्चित रूप से, रॉकेट को बल पैदा करने आैर गर्म गैस बनाने के लिए प्रणोदक को जलाकर जोर लगाना पड़ता है। इसके बाद यह उन गर्म गैस को नोजल से बाहर निकाल देता है। यह उसी तरह होता है, जैसे-एक गुब्बारे को फुलाकर छोड़ देने पर वह हवा में उड़ता है। रॉकेट प्रणोदक में ईंधन और ऑक्सीडाइजर दोनों होते हैं। ईंधन आम तौर पर ज्वलनशील होता है, सामान्यत: हाइड्रोजन, मीथेन या केरोसिन। ऑक्सीडाइजर आम तौर पर तरल ऑक्सीजन होता है, जो ईंधन के साथ प्रतिक्रिया करता है और इसे जलने देता है। पृथ्वी छोड़कर अंतरिक्ष में जाने के लिए रॉकेटों को बहुत अधिक बल की जरूरत पड़ती है, इसलिए वे बहुत तेजी से प्रणोदक का उपयोग करते हैं। जिस तरह बाइक को दूसरे स्थान पर जाने के लिए कम से कम जिस गति की जरूरत होती है, वैसे ही रॉकेट को पृथ्वी की कक्षा से बाहर जाने के लिए कम से कम 25,020 मील प्रति घंटा (40,000 किलोमीटर प्रति घंटा) गति की जरूरत पड़ती है। वैज्ञानिक इस गति को पलायन वेग कहते हैं। यदि गति इससे थोड़ी भी कम हुई, तो रॉकेट लौटकर पृथ्वी पर गिरेगा।
ग्रह जितना बड़ा होता है, उसके गुरुत्वाकर्षण से दूर जाने के लिए उतने ही बल की जरूरत पड़ती है। जैसे-हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह बृहस्पति है, यह इतना बड़ा है कि इसमें हमारी एक हजार जैसी पृथ्वियां समा जाएंगी। इसलिए बृहस्पति के गुरुत्वाकर्षण से बाहर जाने के लिए रॉकेट को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से पांच गुना अधिक करीब 2,14,000 किलोमीटर प्रति घंटा गति की जरूरत पड़ेगी। किसी कक्षा को छोड़ने की चरम गति ब्लैक होल की होगी, एक अरब किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक। चूंकि यह नामुमकिन है, इसलिए ही इसे ब्लैक होल कहते हैं। -द कन्वर्सेशन से