यह बिल्कुल एक फिल्मी दृश्य था। लखनऊ में एक घर की घंटी बजती है। यहां पत्रकार आबिद अपने परिवार के साथ रहते हैं। जैसे ही वह दरवाजा खोलते हैं, कुछ लोग उन पर लाठी, डंडों से हमला कर देते हैं। शोर होता है। शोर सुनकर अचानक पत्रकार की पत्नी बाहर आकर यह दृश्य देखती हैं। वह दौड़कर घर के अंदर जाती हैं और पिस्तौल से हमलावरों पर गोली चलाने लगती हैं। फिर हमलावर भाग जाते हैं। बाद में आबिद भी उन पर गोलियां चलाते हैं। इस घटना में आबिद को चोट लगी है, मगर अपनी पत्नी के कारण उनकी जान बच गई। आबिद की पत्नी की बहादुरी की जितनी तारीफ की जाए कम है।
न जाने क्यों इस घटना से इस लेखिका को सफदर हाशमी पर हमला और बाद में उनकी मौत याद आ गई। इसी दो जनवरी को सफदर की मृत्यु को पूरे उनतीस साल हुए। गाजियाबाद के झंडापुर गांव में जन नाट्य मंच के झंडे तले हल्ला बोल नाटक करते हुए सफदर पर हमला हुआ था और बाद में अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई थी। सफदर की पत्नी मलयश्री हाशमी भी उस नाटक में काम कर रही थीं। सफदर की मृत्यु के ठीक अगले दिन झंडापुर में ही इस नाटक का फिर से आयोजन किया गया और मलयश्री ने उसमें भूमिका निभाई। उस समय बहुत से अखबारों ने उनके चित्र मुखपृष्ठ पर छापे थे। यह भी साहस का वैसा ही अनुपम उदाहरण था, जो आबिद की पत्नी ने किया।
साहित्य अकादेमी परिसर में जब एक सभा का आयोजन किया गया था, तो उस समय दिल्ली के मुख्य कार्यकारी पार्षद जगप्रवेश चंद्र थे। वह सभा में आए और मंच पर सिर झुकाकर खड़े हो गए। लोगों ने उस समय उनकी पार्टी और उन्हें न जाने कितना भला-बुरा कहा, लेकिन वह सिर झुकाकर ही खड़े रहे, क्योंकि सफदर पर हमला कांग्रेस के लोगों ने किया था। उस समय भी जगप्रवेश चंद्र बहुत बूढ़े थे। एक बुजुर्ग का इस तरह से सिर झुकाकर हर तरह के अपमान को झेलना भी कम साहसपूर्ण कदम नहीं था। आज कितने नेताओं में इस तरह से अपनी पार्टी की गलती को स्वीकारने की हिम्मत है। उस समय भी मलयश्री को किसी ने भला-बुरा कहते नहीं सुना। इस तरह का साहस और धैर्य आखिर कितनी पत्नियों और महिलाओं में मिलता है। आम तौर पर तो जब कभी कोई ऐसी दुर्घटना हो जाती है, तो पत्नियां मदद के लिए रोती-पुकारती नजर आती हैं। और कहती हैं कि उनके सामने उनके प्रियजनों को मार दिया गया और लोग तमाशबीन बने रहे। एक तरह से वे बार-बार खुद को कमजोर साबित करती हैं। इसमें उनका दोष भी नहीं। उन्हें सिखाया ही यही जाता है कि वे कमजोर हैं और गुंडों के सामने सिर्फ रोती-गिड़गिड़ाती रह सकती हैं।
ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं, जहां अपराधियों से पत्नियां लोहा लेती हों, अपने पति ही नहीं घर के अन्य सदस्यों की जान बचाती हों या उनके सम्मान की रक्षा करने के लिए मलयश्री की तरह उसी जगह जाकर चौबीस घंटे बाद ही नाटक करती हों और अपराधी फिर से हमला करने की हिम्मत न जुटा पाते हों।
ये इस दौर की नई सावित्री की कथाएं हैं, जो यम या काल का पीछा करती हैं और अपने पति के सम्मान की रक्षा और उनकी जान बचाने के लिए हर तरह की लड़ाई लड़ने को तैयार हो जाती हैं। पत्नी होने का अर्थ ही है सही साथीपन। और यह भी कि पति-पत्नी दोनों ही एक-दूसरे के सच्चे साथी हो सकते हैं। जीवन की रफ्तार तभी ठीक रहती है। साथीपन निभाने वाले ही समाज में उदाहरण दिए जाने के योग्य बनते हैं, जैसे आबिद की पत्नी या मलयश्री बनीं।