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गांगेय डाल्फिन के अस्तित्व पर संकट, बता रहे हैं सतीश सिंह

सतीश सिंह
Updated Wed, 07 Oct 2020 02:46 AM IST
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डॉल्फिन - फोटो : अमर उजाला

डाल्फिन मूलत: समुद्र में पाई जाती है, पर इसकी कुछ प्रजातियां मीठे पानी में भी पाई जाती हैं। कुछ वर्षों पहले तक 88 प्रजातियों में से चार प्रजातियां नदियों के मीठे पानी में पाई जाती थीं। पर मौजूदा समय में इनमें से तीन ही अपना अस्तित्व बचाने में कामयाब रही हैं। अब गंगा को छोड़कर सिंधु एवं अमेजन नदी में ही डाल्फिन पाई जाती है, जिसे भुलन और बोटा के नाम से जाना जाता है।



गंगा में पाई जाने वाली डाल्फिन (गांगेय डाल्फिन) हमारा राष्ट्रीय जलीय जीव है। वर्ष 1996 में गांगेय डाल्फिन को लुप्तप्राय प्राणी घोषित किया गया था। इसके बावजूद संरक्षण के लिए अब तक गंभीर प्रयास नहीं किए गए हैं। वर्ष 1982 में इसकी आबादी 6,000 थी, जो अब घटकर 1,200 से 1,800 के बीच रह गई है।


गांगेय डाल्फिन को जुझारू माना जाता है, क्योंकि यह प्रतिकूल माहौल में भी जीने का माद्दा रखती है। तापमान में होने वाले बड़े उतार-चढ़ाव के साथ यह आसानी से सामंजस्य बैठा लेती है। फिर भी इसकी संख्या का तेजी से कम होना चिंता का विषय है।


आमतौर पर यह गंगा और उसकी सहायक नदियों के संगम पर पाई जाती है, ताकि मुश्किल की घड़ी में यह सहायक नदियों को अपना बसेरा बना सके। गंगा नदी में पानी कम होने पर यह सहायक नदियों में अपना अस्थायी घर बनाती है। गांगेय डाल्फिन को छिछले पानी एवं संकरी चट्टानों में रहना पसंद नहीं है।


गंगा नदी में पाई जाने वाली डाल्फिन का प्रचलित नाम सोंस है। मादा गांगेय डाल्फिन की नाक एवं शरीर की लंबाई नर से अधिक होती है। एक वयस्क गांगेय डाल्फिन का वजन 70 से 100 किलोग्राम के बीच होता है। मादा डाल्फिन की गर्भधारण अवधि नौ महीनों की होती है और वह एक बार में एक बच्चे को जन्म देती है।


वर्तमान में गांगेय डाल्फिन का निवासस्थल भारत के गंगा, ब्रह्मपुत्र, मेघना, बांग्लादेश के करनाफुली, सांगू और नेपाल के करनाली व सप्तकोशी नदी में है। कभी यह जीव नदियों के सभी हिस्सों में विचरण करती थी, लेकिन वर्ष 1966 में नरौरा, वर्ष 1975 में फरक्का और वर्ष 1984 में बिजनौर में बैराज बनने से इसका घर तीन भागों में बंट गया।


बैराजों ने गंगा नदी को निचले, मध्य और अग्र भागों में बांट दिया है, जिसकी वजह से गांगेय डाल्फिनों के लिए गंगा के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक जाना मुश्किल हो गया है। नरौरा परमाणु संयंत्र एवं कानपुर के कारखानों से निकलने वाले रासायनिक कचरे के गंगा में प्रवाहित होने से उसके निचले भाग जैसे, नरौरा और कानपुर के आसपास रहने वाली गांगेय डाल्फिनें धीरे-धीरे मर गईं।
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बैराज निर्माण से गंगा का प्रवाह बहुत-सी जगहों पर अवरुद्ध हो गया है। नदी में पानी का स्तर कम होने के कारण गांगेय डाल्फिन को स्वाभाविक जीवन जीने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। गाद के कारण नदी उथली हो गई है। आज गांगेय डाल्फिन का शिकार करना शिकारियों के लिए आसान हो गया है।


इसका शिकार मांस, तेल, चारे (कैटफिश को पकड़ने के उद्देश्य से) आदि के लिए किया जाता है। जागरूकता के अभाव में या लालच के कारण भी इन्हें मार दिया जाता है। पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर पटना, बनारस आदि शहरों में गंगा नदी में स्टीमर व फेरी चलाए जा रहे हैं, जिससे गांगेय डाल्फिन टकराकर घायल हो जाती हैं या फिर मर जाती हैं।


ध्वनि प्रदूषण से भी इनके स्वास्थ पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कई बार ये मछुआरों के जाल में भी फंस जाती हैं। गंगा में उर्वरक, कीटनाशक, औद्योगिक एवं घरेलू कचरे का संकेंद्रण तेजी से बढ़ रहा है। जलीय प्रदूषण के कारण गांगेय डाल्फिन की आयु कम हो रही है। एक अनुमान के मुताबिक, 15 लाख मीट्रिक टन रासायनिक उर्वरक, 21,000 टन टेक्निकल ग्रेड पेस्टीसाइड प्रतिवर्ष गंगा और ब्रह्मपुत्र में प्रवाहित किया जाता है। 


गांगेय डाल्फिन को बचाने के लिए डाल्फिन पार्क की स्थापना की जा सकती है, मछुआरों व आम लोगों को जागरूक बनाया जा सकता है, शिकारियों पर अंकुश लगाया जा सकता है, भूलवश या जान बचाने के लिए नहर या सहायक नदियों में गई डाल्फिनों का सुरक्षित पुनर्वास किया जा सकता है, पर अब भी ऐसे प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। जाहिर है, बिना कोई ठोस प्रयास किए इस मामले में सकारात्मक परिणाम नहीं निकलेंगे।

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