साधो, मैं जानता था कि एक दिन उनके चरण कमल हो जाएंगे। ऐसा मैंने तभी भांप लिया था, जब वह पूत थे और पालने में झूला करते थे। वे चरण थे भी कमल होने के लायक। कमल में रूपांतरित होते ही चरण पूजनीय हो जाते हैं। फिर वे चरण नहीं रहते। मैं एक सज्जन को जानता हूं, जिनके चरण पहले जमीन पर पड़ा करते थे। वह कहते भी थे कि मैं जमीन से जुड़ा आदमी हूं।
धीरे-धीरे वह तरक्की की सीढ़ियां-दर-सीढ़ियां चढ़ते चले गए। एक दिन देखता क्या हूं कि जिन चरणों के बल पर वे इतनी ऊंचाई पर पहुंचे हैं, वे उनके शरीर से नदारद हैं। मैं समझ नहीं पा रहा था कि माजरा क्या है। एक मित्र ने कहा, उनके चरण तो बहुत ऊपर उठकर कमल हो गए हैं, इसलिए उन्हें धरती पर टिका देखने की ख्वाहिश पालना ठीक नहीं। कमल होते ही चरण पगडंडियों पर नहीं चलते। वे उस ओर बढ़ने लगते हैं, जो रास्ता राजभवन की ओर जाता है। यह भी हो सकता है कि कमल हुए चरण जिस तरफ चल पड़ते हों, उधर राजमार्ग निर्मित हो जाता हो।
कमल हो गए चरण जिस रास्ते पर अपने निशान छोड़ते हैं, उन पर दूसरों को चलने की प्रेरणा मिलती है। पर ऐसा चाहने वाले सभी चरणों को कमल होने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता। चरणों का भी भाग्यफल होता है। चरण जब-जब कमलत्व को प्राप्त हुए, तभी उन्होंने अमरत्व का पान किया। नए इतिहास की रचना के लिए चरणों को कमल में तब्दील करना पहली शर्त है। एक बार मैंने अपने चरणों को कमल बनाने की ठान ली। उन्हें खूब धोया। रगड़ा। मांजा। तेज-फुलेल लगाया। पर कमबख्त चरण थे कि कमल हुए ही नहीं। आम चरण कभी-कभार ही कमल हो पाते हैं।
कमल होने वाले चरणों पर सिर नवाया कि भवसागर तर गए। इसीलिए फल पाने की इच्छा में इन चरणों को लोग एक बार पकड़ लें, तो छोड़ते नहीं। किसी के चेहरे पर मेरी दृष्टि बाद में जाती है। मैं पहले परखता हूं कि उसके चरण कमल हुए या नहीं। यदि चरण कमल नहीं हैं, तो वह व्यक्ति मेरे लिए आदरणीय नहीं रहता।