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जश्न है पितामह के मानने पर

Tue, 18 Jun 2013 11:35 PM IST
अंशुमाली रस्तोगी
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अंततः पितामह मान गए। थोड़ा देर से माने, पर मान गए। मानना था ही उन्हें। न मानते तो पीएम इन वेटिंग की संभावना से भी जाते। मानने में ही उनकी बेहतरी का राज छिपा है।
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अरे, भई वो पितामह हैं। पितामह को हक है, अपने बच्चों से नाराज होने का। और बच्चों का फर्ज है, नाराज पितामह को मनाने का। क्या करें, पितामह वाली उम्र ही कुछ ऐसी होती है, जिसमें रूठने या मुस्कुराने का पता ही नहीं चलता। बेहतर यही है कि रूठे को मनाएं और मुस्कुराते हुए के साथ मुस्कुराएं।

सच बताऊं, मुझे सदमा-सा पहुंचा था, पितामह के नाराज होने का। डेढ़ दिन तलक तो न मैंने कुछ खाया, न पिया। बस एकटक टीवी पर नजरें गढ़ाए बैठा रहा कि कब पितामह के मानने की खबर आए, कब पितामह के चेहरे पर मंद-सी हंसी देखने को मिले।
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यों भी, पितामह की यह उम्र थोड़े है रिटायर होने की। अभी उन्हें बहुत कुछ करना है पार्टी, देश और जनता के लिए! पितामह ने इस्तीफा तो केवल यह देखने के लिए दिया था कि आ देखें जरा किसमें कित्ता है दम! आखिर दमदार पितामह ही साबित हुए।

इससे पता चलता है कि पितामह का पार्टी के भीतर सिक्का अब भी बरकरार है। चाहे दबे शब्दों में ही सही, पार्टी अध्यक्ष से लेकर बड़े-छोटे कार्यकर्ता तक पितामह की प्रशंसा में पीछे नहीं रहे।

फिर भी कुछ लोग हैं, जो पितामह की नाराजगी के बहाने चुटकियां ले रहे हैं। कह रहे हैं, पार्टी का अंदरुनी महाभारत खुलकर सामने आ गया। कह यह भी रहे हैं, पार्टी के सयानों ने पितामह को हाशिए पर धकेल दिया। लेकिन प्यारे ये सब बेकार की बातें हैं। वह कहावत है न, जित्ते मुंह उत्ती बातें।

न बातें खत्म हो सकती हैं, न मुंह बंद हो सकते हैं। तो बेहतर यही है कि लोगों की बातों पर खाक डाली जाए और पितामह के मानने पर मिठाइयां बांटी-बंटवाईं जाए।

आखिर रूठे हुए पितामह माने हैं, कोई ऐरा-गैरा अंदा-बंदा नहीं। मेरे विचार में, पार्टीजनों को अब पितामह के पीएम इन वेटिंग वाले सपने को पूरा कराने का प्रयास जी-जान से करना चाहिए। पिछली दफा नहीं हो पाई, कम से कम इस बार पितामह की सीट कंफर्म होनी ही चाहिए।

लेकिन फिलहाल, यह समय पितामह के मानने पर जश्न मनाने का है। पितामह को शुभकामनाएं देने का। आगे अब वे न रूठें, यह भी ध्यान में रखने का। बाकी संघ संभाल लेगा।
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