दक्षिण की एक रियासत के राजा कृष्णशक्ति धर्मपरायण और न्यायप्रिय थे। वह प्रजा की भलाई के कामों में जुटे रहते थे, लेकिन उनके भाई-भतीजे बहुत स्वार्थी थे।
वे चाहते थे कि राजा राज्य की संपत्ति धर्म-कर्म में खर्च न करें और उन्हें भी उसका सुख भोगने दें। राजा को राजधर्म पर अटल देखकर उन्होंने षड्यंत्र रचकर राज्य हड़प लिया। राजा को पास के राज्य में जाना पड़ा। वहां अपना नाम बदलकर वह राजा विक्रमादित्य की सेना में शामिल हो गए।
अपने गुण और विवेक के कारण कुछ ही समय में कृष्णशक्ति ने विक्रमादित्य का मन जीत लिया। राजा ने उन्हें अपना प्रमुख सलाहकार बना दिया।
एक दिन कृष्णशक्ति की पत्नी का पत्र गुप्त रूप से उनके पास पहुंचा। वह रात में दीये की रोशनी में पत्र पढ़ रहे थे कि अचानक राजा विक्रमादित्य वहां आ पहुंचे और चुपचाप पत्र में लिखी बातें सुनते रहे।
वह समझ गए कि कृष्णशक्ति तो स्वयं राजा रह चुके हैं। उनकी प्रजा की दयनीय स्थिति की बात सुनते ही वह द्रवित हो उठे। उन्होंने कृष्णशक्ति को खांडवटक ग्राम का प्रधान बना दिया।
विक्रमादित्य की सहायता से कृष्णशक्ति ने अपने राज्य पर पुनः अधिकार पा लिया। राज्य की जनता ने कुशासन से मुक्ति पाते ही जश्न मनाया।
कृष्णशक्ति के अत्याचारी भाई को राज्य छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। राज्य में पुनः धर्म-कर्म का बोलबाला हो गया।