अनशन करना तो आसान है, लेकिन वह जारी है या टूट गया, यह साबित करना मुश्किल है, क्योंकि यह काम हमेशा दूसरे ही लोगों के जिम्मे रहता है। अनशन करनेवाला तो अनशन ही कर सकता है, इसलिए वह कभी नहीं बोलता है कि अनशन टूट गया या जारी है। पक्ष और विपक्ष अपनी-अपनी दलील देते हैं और अपनी बात सिद्ध करने की कोशिश करते हैं। इस बीच, अनशनकारी अगर बोलने की कोशिश भी करे, तो उसे डपट दिया जाता है कि हम बात कर रहे हैं न, आप तो चुपचाप पड़े रहिए।
देखिए, ग्लूकोज की बॉटल लग गई है न...यानी अनशन खत्म! अब कुछ नहीं हो सकता। विरोधी पार्टी के लोग दबाव बनाने की कोशिश करते हैं।
अजी वाह! ऐसे कैसे अनशन खत्म हो जाएगा। कल से तो आप यह भी कहने लगेंगे कि सांस ले रहे हैं, तो अनशन खत्म! मान लिया कि पानी में ग्लूकोज है, लेकिन वह अन्न तो है नहीं।
अच्छा तो अनशन तोड़ने के लिए फिर हलवा-पूड़ी खिलाना चाहिए। जूस क्यों पिलाते हैं? अगर जूस से अनशन टूट सकता है, तो फिर ग्लूकोज सलाइन से क्यों नहीं।
जूस से अनशन तुड़वाने का रिवाज है, इसलिए ऐसा किया जाता है। लेकिन जूस से अनशन नहीं टूटता।
तो फिर आप काहे से तुड़वाएंगे अनशन? सोमरस से ...?
देखिए, आप अच्छे-खासे चल रहे अनशन को तोड़ने में लगे हैं। हम तो कहते हैं कि अभी एक सप्ताह और चल सकता है यह अनशन। आपको अनशन से क्या तकलीफ है? हम किसी को परेशान तो नहीं कर रहे, लोकतंत्र में विरोध दर्ज करने के शांतिप्रिय तरीके पर ही चल रहे हैं।
ऐसे ग्लूकोज और शहद-पानी पी-पीकर तो लोग पूरी उम्र निकाल देते हैं। क्या वे अनशन पर होते हैं?
अरे वाह। अजब दादागीरी है! हम तो अड़े हैं कि अनशन जारी है और आगे भी जारी रहेगा। हम भी तो देखें क्या करते हो। मरते मर जाएंगे, मगर अनशन खत्म नहीं मानेंगे।
अनशन कोई उपवास नहीं है कि फलाहार कर लिया, फिर भी जारी है। हम आपके इस अनशन को यहीं खत्म मानते हैं।
तो फिर मैं उठ जाऊं...? अनशनकारी कराहता है।
कहा न, आप चुपचाप पड़े रहिए। यह फैसला तो हो जाने दीजिए कि अनशन खत्म हुआ या जारी है। कहकर अनशनकारी को फिर धमका दिया गया। बहस अभी जारी है!