मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने अर्थव्यवस्था की बदहाल हालत को सुधारने के लिए एक बड़े दांव के रूप में 12 क्षेत्रों के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) सीमा में बढ़ोतरी और नियमों को सरल करने का फैसला लिया है। इस फैसले की बारीकियां संबंधित अधिसूचना जारी होने के बाद सामने आएंगी, लेकिन पिछले कुछ माह से जिस तरह सरकार आर्थिक मोर्चे पर ताबड़तोड़ फैसले ले रही है, उसे नीतिगत जड़ता के ठप्पे को तोड़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
सरकार में आर्थिक मोर्चे की कमान संभालने वाले वित्त मंत्री पी. चिदंबरम, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अलहूवालिया और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष सी. रंगराजन की टीम को मंजे हुए आर्थिक विशेषज्ञों में शुमार किया जाता है। वहीं सरकार की कमान अर्थशास्त्री के रूप में पहचाने जाने वाले मनमोहन सिंह के हाथ में है। लेकिन जिस तरह से अर्थव्यवस्था की विकास दर दशक के सबसे निचले पायदान पर है, रुपये की कमजोरी आम आदमी की दिक्कत बढ़ा रही है, चालू खाता घाटा लगातार रिकॉर्ड बना रहा है और विदेशी मुद्रा भंडार घट रहा है, वे सब मिलकर देश को 1991 जैसे हालत की ओर ले जा रहे हैं।
इस स्थिति के लिए इस पूरी टीम को जिम्मेदार माना जा रहा है, क्योंकि जब पहली बार 2004 में यूपीए के हाथ में सत्ता आई, तो अर्थव्यवस्था के अधिकांश मानक मजबूत स्थिति में थे और विकास दर नए रिकॉर्ड बना रही थी। इसलिए सरकार का एफडीआई से जुड़ा यह फैसला उसकी बेचैनी को दर्शाता है। असल में साल भर के भीतर नई सरकार के लिए चुनाव होने हैं और जिसमें एक दशक से सत्ता संभालने वाले यूपीए की परीक्षा होनी है। यह तय होना है कि देश के आम आदमी के जीवन को बेहतर बनाने की कितनी कोशिश हुई है और उसे आम जनता किस नजर से देखती है।
यह बात सही है कि एफडीआई का प्रवाह देश के लिए अच्छा साबित होगा, क्योंकि एफडीआई पूंजीगत निवेश के रूप में आता है और उससे एसेट क्रिएशन होता है, परिणामस्वरूप रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। ताजा फैसला वित्त मंत्रालय में सचिव अरविंद मायाराम की अध्यक्षता में गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर आया है। इसके तहत जहां टेलीकॉम क्षेत्र में शत-प्रतिशत एफडीआई को अनुमति दी गई है, वहीं कूरियर सर्विस, क्रेडिट इंफोर्मेशन कंपनी और एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों में निवेश सीमा बढ़ाई गई है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, कमोडिटी एक्सचेंज, स्टॉक एक्सचेंज, डिपाजिटरी कॉरपोरेशन जैसे क्षेत्रों में एफडीआई नियमों को सरल करने के साथ कुछ में सीमा बढ़ाई गई है। सबसे अहम फैसला रक्षा क्षेत्र में एफडीआई का है इसकी सीमा 49 फीसदी कर दी गई है, लेकिन 26 फीसदी से अधिक एफडीआई पर सुरक्षा पर कैबिनेट की समिति (सीसीआई) की अनुमति की शर्त लागू की गई है। बीमा के लिए भी सीमा बढ़ा दी गई है।
सरकार के इस फैसले में अहम बात यह है कि सेवा क्षेत्र से जुड़े क्षेत्रों को अहमियत दी गई है। इसके पीछे एक वजह यह हो सकती है कि इन क्षेत्रों में एफडीआई जल्दी आ सकता है, क्योंकि इन क्षेत्रों में काम शुरू करने के लिए मंजूरी प्रक्रिया ज्यादा लंबी नहीं है और अधिकांश मामलों में केंद्र से जुड़े विभाग मंजूरी देने की स्थिति में है। इसलिए चुनावी साल में अर्थव्यवस्था की वित्तीय सेहत को दुरुस्त करने की यह कवायद कुछ नतीजे सामने ला सकती है।
हालांकि सरकार को यह समझने में लंबा समय लग गया कि विदेशी मुद्रा का ज्यादा और टिकाऊ प्रवाह एफडीआई के रास्ते ही संभव है। स्टॉक मार्केट और कम अवधि के कर्ज के रूप में आने वाला एफआईआई निवेश टिकाऊ नहीं है। यही वजह है कि अप्रैल से अब तक देश से करीब तीन अरब डॉलर का एफआईआई निवेश बाहर गया है।
पांच फीसदी विकास दर, करीब दो अंकों की खुदरा महंगाई और 60 रुपये प्रति डॉलर से ऊपर पहुंच चुके रुपये के साथ रोजगार के अवसरों में भारी कमी और राजकोषीय घाटे के ऊंचे स्तर, कमजोर मैन्यूफैक्चरिंग दर के इस माहौल में सरकार का नया दांव निवेशकों को कितना आकर्षित करेगा, कहना मुश्किल है। सरकार के एफडीआई सीमा बढ़ाने वाले फैसले के दिन ही कोरिया की स्टील कंपनी पॉस्को ने तीस हजार करोड़ रुपये के निवेश की परियोजना को वापस लेने की घोषणा भी की। इसी कंपनी की 12 अरब डॉलर के एफडीआई की स्टील परियोजना बरसों से अटकी है, जो देश का किसी भी कंपनी का मैन्यूफैक्चरिंग में सबसे बड़ा एफडीआई प्रस्ताव भी है। सरकार ने पिछले साल सिंगल ब्रांड और खुदरा रिटेल में एफडीआई का दरवाजा खोला था, लेकिन अभी तक एक भी कंपनी देश में प्रवेश नहीं कर सकी है। एफडीआई ही क्यों, घरेलू कंपनियों के तमाम प्रोजेक्ट मंजूरी प्रक्रिया में उलझकर रह गए हैं। यह प्रोजेक्ट ढांचागत सुविधाओं से लेकर मैन्यूफैक्चरिंग तक में हैं, जहां से रोजगार के अवसर आने हैं। हालांकि अब सरकार इस मोर्चे पर अतिरिक्त सक्रियता दिखा रही है, लेकिन पिछले नौ साल के नुकसान की भरपाई क्या अगले नौ माह में हो पाएगी, कहना मुश्किल है।
सरकार के इस कदम की राजनीतिक आलोचना होना तय है और वाम दलों ने इसका विरोध भी शुरू कर दिया है। संसद के मानसून सत्र में विरोध की आंच सरकार पर दिखाई भी देगी, लेकिन इन फैसलों का कोई बड़ा विरोध शायद ही दिखे। सवाल उठता है कि जब सरकार को लगता है कि इन फैसलों की जरूरत थी, तो इतनी देरी क्यों हुई? ऐसा लगता है कि चुनाव में जाने के पहले अर्थव्यवस्था की सेहत दुरुस्त करने के लिए सरकार हर वह दांव खेलना चाहती है, जो इसमें उसकी मदद कर सके।