फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कहां तक जाएगी यह तल्खी

Thu, 02 May 2013 09:20 PM IST
सलमान हैदर (पूर्व राजनयिक)
विज्ञापन
विज्ञापन
लाहौर जेल में कातिलाना हमले से सरबजीत की मौत पर हम सब गमगीन हैं। इसे लेकर देश भर में गुस्सा और गुबार स्वाभाविक है।
विज्ञापन


जो कुछ हुआ है, उससे हम अच्छे ताल्लुकात की कल्पना भी नहीं कर सकते, बल्कि कटुता का ऐसा वातावरण फैल गया है, जिससे जल्दी पार पाना बड़ा मुश्किल होगा।

यह विडंबना ही है कि भारत और पाकिस्तान के बीच दरार पाटने की जितनी कोशिश होती है, उससे ज्यादा ऐसी परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं, जिनसे वैमनस्य बढ़ जाता है।

ऐसा कई बार सुनियोजित और कभी अनजाने में हो जाता है। कई बार जज्बातों को इस कदर हवा दे दी जाती है कि पटरी पर आती बात उलट जाती है। ऐसा कई स्तरों पर होता है।
विज्ञापन


इस तल्खी की शुरुआत हम कसाब और अफजल गुरु को फांसी देने के बाद से कह सकते हैं, जब अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं शोर के रूप में उभरीं। इससे माहौल को बिगाड़ने का मौका मिला।

सरबजीत की हत्या को इसकी एक परिणति माना जा सकता है। इसके लिए लगातार कटुता भरी बयानबाजी और घृणा का माहौल पैदा करने वाली स्थितियां जिम्मेदार रही हैं।

इस दुखद घटना के बाद सवाल है कि चूक कहां हुई। कुछ लोग कह रहे हैं कि भारत की तरफ से सरबजीत को छुड़ाने के पर्याप्त प्रयास नहीं हुए। लेकिन ऐसे मामले में भारत क्या कर सकता था? केवल बातचीत से काम नहीं चलता।

भारत को एक दूसरे देश के कारागार में बंद अपने नागरिक को छुड़ाना था, तो कुछ समझौते ही हो सकते थे। मसलन, सरबजीत के बदले संभव है कि पाकिस्तान भी भारत से अपने किसी नागरिक को छुड़ाने की मांग करता।
ऐसी बातचीत खुफिया तौर पर ही हो सकती थी और कभी बाहर नहीं आती। इस मामले में शायद हम ऐसी कोई डील नहीं कर पाए। ऐसा नहीं कि सरबजीत की रिहाई के लिए बातचीत के दौर नहीं चले। लेकिन फैसला तो आखिर पड़ोसी देश को ही लेना था।

एकाध बार ऐसा लगा भी कि रिहाई संभव है। आसिफ जरदारी ने संकेत दिया था कि वह सरबजीत को छोड़ने के लिए तैयार हैं, मगर उनकी आंतरिक सुरक्षा और आईएसआई द्वारा आंख तरेरने के बाद जरदारी में इतनी हिम्मत नहीं हो सकती थी।

सरबजीत पर हमले के लिए सीधे-सीधे लाहौर जेल प्रशासन की ढिलाई को दोष दिया जा सकता है। उसने एक कैदी को इसी निगाह से देखा कि वह भारतीय है, उनके लिए किसी तरह की हमदर्दी उसके मन में नही दिखी। यह कहना भी गलत होगा कि पाकिस्तान में चुनाव को देखते हुए सोची-समझी नीति के तहत ऐसा किया गया होगा।

इस आरोप की कोई वजह नहीं कि जरदारी ने किसी राजनीतिक हित के लिए ऐसा हमला कराया होगा। यह जरूर है कि दोनों मुल्कों के बीच जिस तरह चरम स्तर पर नफरत फैली है, जेल में सरबजीत उसका निशाना बने।

यह भी कह सकते हैं कि कसाब और अफजल गुरु को फांसी देने के बाद पाकिस्तान में बदला लेने की नीयत यहां तक बढ़ गई हो। अगर ऐसा है, तो फिर दोनों देशों की जेलों में सुरक्षा व्यवस्था को और दुरस्त करने की जरूरत बढ़ गई है। यह तनाव फिलहाल रुकने वाला नहीं है।

सवाल हमारी सुरक्षा व्यवस्था पर भी है। क्या पाकिस्तान में ऐसी वारदातों को देखते हुए हम किसी आतंकवादी के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाएं? हमें अपने कानून और नागरिकों की सुरक्षा को अहम मानते हुए कठोरता तो दिखानी होगी।

लेकिन कुछ जगहों पर अतिरेक से संयम बरतना होगा। खासकर जब मामला अति नाजुक हो, तो गलत संवाद दिशा बदल देते हैं। भारत के सियासी दलों, राजनयिकों, सामाजिक संगठनों को जज्बातों को काबू में रखते हुए बारीक रस्सी पर चलना होगा।

सरबजीत के इस दुखद अध्याय के बाद हमारा ध्यान पाकिस्तान की जेलों में बंद मछुआरों और युद्ध बंदी सैनिकों की तरफ जाता है।

पानी की कोई पहचान नहीं है, ऐसे में यह अमानवीय है कि एक मछुआरा सीमा के पार चला जाए और काल कोठरी में बंद हो जाए। या एक सैनिक वर्षों तक जेल की सलाखों में बंद रहे।

खासकर सरबजीत को लेकर पाकिस्तान के जो भी दावे हों, लेकिन इतना जरूर है कि उसने दो दशक से ज्यादा जेल में काट लिए थे। उसे मानवीय आधार पर छोड़ देना चाहिए था। पाकिस्तान ने ऐसा नहीं किया। पर भविष्य में दोनों देशों को ऐसा कदम उठाना होगा कि किसी मासूम के साथ जुल्म न हो।
विज्ञापन


अभी दोनों ही मुल्कों को चुनाव से गुजरना है। ऐसे में संकीर्ण नजरिया हालात खराब कर सकते हैं। सरबजीत की हत्या के बाद तल्खी रहेगी ही। पर दुख यही है कि दो साल और बीत जाते, तो शायद सरबजीत के लिए रिहाई का मौका बन जाता। उनकी कैद के पच्चीस साल का इंतजार नहीं किया गया। उससे पहले ही उनका जीवन ले लिया गया।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें