सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई और सरकार को लेकर जो टिप्पणी की है, उसके बाद न कुछ कहने को बचा है, न पूछने को, फिर भी सरकार खुद को बचाने में लगी है। जो मनमोहन सिंह जीवन भर अपनी छवि बचाने में लगे रहे, वह अब कुर्सी बचाने के लिए जीवन दांव पर लगा रहे हैं।
कोई कह रहा है, शीर्ष अदालत ने जो कहा है, वह टिप्पणी है, कोई फैसला नहीं। किसी ने बताया कि जो भी हो, इसमें प्रधानमंत्री का नाम तो किसी ने नहीं लिया।
किसी का तर्क है कि सीबीआई के अधिकारियों को बुलाना कानून मंत्री का अधिकार है। यह कहने वाले लोग भी हैं कि यह सिर्फ मीडिया का शोर है, देश के आम आदमी को कोयले और सीबीआई से क्या मतलब।
कौन नहीं जानता कि अश्विनी कुमार मनमोहन सिंह के करीबी हैं। मनमोहन सिंह ने ही छोटे कद के अश्विनी कुमार को बड़े दर्जे का कानून मंत्री बनाया। यह भी कोई रहस्य नहीं है कि कोयला घोटाले में सीबीआई कहीं न कहीं प्रधानमंत्री पर उंगली उठा रही थी, क्योंकि जब गड़बड़ हुई, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कोयला मंत्री थे।
अश्विनी कुमार ने प्रधानमंत्री को बचाने के लिए जान लगा दी। सीबीआई निदेशक को तलब किया और पूछा कि सीबीआई सर्वोच्च न्यायालय को हलफनामे में क्या बताएगी? उस बैठक में सरकार के कानूनी अधिकारी थे, प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी थे। अब यह कोई नादान भी समझ सकता है कि उस बैठक का मकसद क्या था।
जानकारों ने बताया कि बैठक में कानून मंत्री ने सीबीआई अधिकारियों को डांट लगाई। उनकी अंग्रेजी का मजाक उड़ाया, उनके हलफनामे को कानूनी गलतियों से भरपूर बताया। और फिर हलफनामे में बदलाव किए। वहां बैठे मंत्री जी के तेवर देखकर अधिकारियों ने भी हलफनामे पर हाथ साफ किए, यह क्यों हुआ, यह बताने के लिए क्या डॉक्टरेट की जरूरत है?
जब यह खबर अखबार में छपी कि सीबीआई सर्वोच्च न्यायालय को यह बताएगी कि जो हलफनामा दायर किया जा रहा है, उसे कानून मंत्री, कानूनी अधिकारियों और प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों ने देखा है, तो अधिकारियों की हवा निकल गई। लेकिन कानून मंत्री तो किताबें पढ़कर यह बता रहे थे कि इसमें कुछ गलत नहीं है।
वह तो यह ढूंढ रहे थे कि यह खबर लीक किसने की। जिस दिन खबर छपी थी, उसी दिन मनमोहन सिंह अगर कानून मंत्री को हटा देते, तो थोड़ी-बहुत इज्जत बच जाती। पर अब तो उनकी अपनी कुर्सी संकट में है, वह इस्तीफा कैसे दे सकते हैं। उन्हें जरूर बता दिया गया होगा कि इस समय देश खतरे में है।
एक तरफ चीन उन्नीस किलोमीटर अंदर घुस आया है, पाकिस्तान धमकी दे रहा है, श्रीलंका नाराज है, नेपाल में अस्थिरता है। मनमोहन सिंह को समझाया गया होगा कि चुनाव सामने हैं, राहुल गांधी अभी तैयार नहीं है, सोनिया गांधी बीमार हैं, अगर आपने भी छोड़ दिया, तो कौन संभालेगा! लेकिन मामला इतना आसान नहीं दिखता। सर्वोच्च न्यायालय ने पूछा है कि सीबीआई के हलफनामे में क्या बदलाव हुए, किसने किए, क्यों किए, बैठक में कौन-कौन था।
सवाल और भी उठेंगे। प्रधानमंत्री कैसे कहेंगे कि सीबीआई स्वतंत्र है। कानून मंत्री कैसे कहेंगे कि सीबीआई का इस्तेमाल प्रधानमंत्री को बचाने के लिए नहीं किया गया। लॉ ऑफिसर्स क्या जवाब देंगे कि उन्होंने अपने ज्ञान का इस्तेमाल सीबीआई को दबाने के लिए कैसे किया।
क्या पीएमओ बताएगा कि उसने अपने इकबाल का इस्तेमाल सीबीआई को डराने के लिए किया। ये बातें ऐसी हैं कि जब निकलेंगी, तो दूर तलक जाएंगी। और लोग सरकार से कोर्ट की नाराजगी का सबब पूछेंगे। ये भी पूछेंगे कि तुम इतने परेशां क्यों हो। पार्टी के लोग एक बार फिर यही कहेंगे कि ऐसी खबरों का असर मत लेना। लोग मासूम हैं, चंद दिनों में भूल जाएंगे।
बस दिक्कत इतनी है कि यह सलाह असलियत से कोसों दूर है। जनता के अविश्वास का तेजाब बड़ी से बड़ी ताकत तबाह कर देता है।