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गंगा के लिए त्याग करते संत

सुरेश भाई
Updated Sun, 01 Mar 2020 05:28 PM IST
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सांकेतिक चित्र - फोटो : Social Media
मातृसदन के संतों द्वारा गंगा रक्षा के लिए दिए जा रहे इस बलिदान के प्रति सरकार गंभीर है? और अगर ऐसा नहीं लगता है, तो राज-समाज के पास इनके लिए किस तरह के न्याय का प्रावधान है। भगीरथ ने कठिन तपस्या करके गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारा था। उन्होंने यह नहीं सोचा होगा कि एक समय ऐसा भी आएगा, जब मोक्षदायिनी गंगा को बचाने के लिए मातृसदन, हरिद्वार के संतों को एक के बाद एक अपना बलिदान देना पड़ेगा।

यह जग-जाहिर है कि मातृसदन के संत प्रदर्शन, हड़ताल, सड़क जाम किए बिना अपना भोजन और पानी त्यागकर अहिंसक रूप में केंद्र और राज्य सरकार से गंगा को निर्मल और अविरल बनाने के लिए सत्याग्रह के रास्ते पर खुद का जीवन न्यौछावर कर रहे हैं। 


मोदी सरकार भी नमामि गंगे परियोजना के माध्यम से गंगा की निर्मलता के लिए प्रयत्नशील है। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि ऐसी महत्वाकांक्षी परियोजना के चलते मातृसदन के संतों के बीच से निकल रही गंगा की आवाज को पहचानने का प्रयास नहीं हुआ है।

संतों के अन्न-जल त्याग कर बलिदान होने के जज्बे के प्रति समाज व सरकार को तमाशबीन नहीं बनना चाहिए। गौरतलब है कि मातृसदन में इससे पहले पूर्व आईआईटी प्रोफेसर जीडी अग्रवाल, जो बाद में स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद बने, अक्तूबर, 2018 में 112 दिनों के उपवास के बाद प्राण न्यौछावर कर गए।

इसके पहले वर्ष 2011 में, स्वामी निगमानंद का 115 दिन के उपवास के बाद प्रणांत हो गया। स्वामी आत्मबोधानंद भी दूसरी बार उपवास कर रहे हंै। 15 दिसंबर 2019 से अनशनरत मातृसदन की अनुयायी साध्वी पद्मावती अंतिम सांस लेने की स्थिति में हैं।

संतों द्वारा गंगा रक्षा के लिए दिए जा रहे इस बलिदान के प्रति सरकार गंभीर है? और अगर ऐसा नहीं लगता है, तो राज-समाज के पास इनके लिए किस तरह के न्याय का प्रावधान है। ऐसा इसलिए क्योंकि, मातृसदन के दो संतों के बलिदान के बावजूद  साध्वी पद्मावती के प्राणों को बचाने के प्रयास नजर नहीं आ रहे हैं।
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यूपीए सरकार के समय भी स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद ने पांच बार उपवास किया था, तब वर्ष 2013 में, तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उन्हें आश्वासन दिया था, कि केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद उनकी सारी मांगें मान ली जाएंगी। एनडीए की सरकार बनने के बाद वह अपनी आवाज उठाते रहे, पर पिछले साल एक उपवास के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।
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सांकेतिक चित्र - फोटो : Social Media
मातृसदन के संतों द्वारा गंगा रक्षा के लिए दिए जा रहे इस बलिदान के प्रति सरकार गंभीर है? और अगर ऐसा नहीं लगता है, तो राज-समाज के पास इनके लिए किस तरह के न्याय का प्रावधान है। भगीरथ ने कठिन तपस्या करके गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारा था। उन्होंने यह नहीं सोचा होगा कि एक समय ऐसा भी आएगा, जब मोक्षदायिनी गंगा को बचाने के लिए मातृसदन, हरिद्वार के संतों को एक के बाद एक अपना बलिदान देना पड़ेगा।

यह जग-जाहिर है कि मातृसदन के संत प्रदर्शन, हड़ताल, सड़क जाम किए बिना अपना भोजन और पानी त्यागकर अहिंसक रूप में केंद्र और राज्य सरकार से गंगा को निर्मल और अविरल बनाने के लिए सत्याग्रह के रास्ते पर खुद का जीवन न्यौछावर कर रहे हैं। 

मोदी सरकार भी नमामि गंगे परियोजना के माध्यम से गंगा की निर्मलता के लिए प्रयत्नशील है। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि ऐसी महत्वाकांक्षी परियोजना के चलते मातृसदन के संतों के बीच से निकल रही गंगा की आवाज को पहचानने का प्रयास नहीं हुआ है।

संतों के अन्न-जल त्याग कर बलिदान होने के जज्बे के प्रति समाज व सरकार को तमाशबीन नहीं बनना चाहिए। गौरतलब है कि मातृसदन में इससे पहले पूर्व आईआईटी प्रोफेसर जीडी अग्रवाल, जो बाद में स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद बने, अक्तूबर, 2018 में 112 दिनों के उपवास के बाद प्राण न्यौछावर कर गए।

इसके पहले वर्ष 2011 में, स्वामी निगमानंद का 115 दिन के उपवास के बाद प्रणांत हो गया। स्वामी आत्मबोधानंद भी दूसरी बार उपवास कर रहे हंै। 15 दिसंबर 2019 से अनशनरत मातृसदन की अनुयायी साध्वी पद्मावती अंतिम सांस लेने की स्थिति में हैं।

संतों द्वारा गंगा रक्षा के लिए दिए जा रहे इस बलिदान के प्रति सरकार गंभीर है? और अगर ऐसा नहीं लगता है, तो राज-समाज के पास इनके लिए किस तरह के न्याय का प्रावधान है। ऐसा इसलिए क्योंकि, मातृसदन के दो संतों के बलिदान के बावजूद  साध्वी पद्मावती के प्राणों को बचाने के प्रयास नजर नहीं आ रहे हैं।

यूपीए सरकार के समय भी स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद ने पांच बार उपवास किया था, तब वर्ष 2013 में, तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उन्हें आश्वासन दिया था, कि केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद उनकी सारी मांगें मान ली जाएंगी। एनडीए की सरकार बनने के बाद वह अपनी आवाज उठाते रहे, पर पिछले साल एक उपवास के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।

अवैध खनन और बांधों पर रोक लगाने की मांग

मातृसदन आश्रम करीब एक दशक से गंगा रक्षा के लिए अवैध खनन और बांधों पर रोक लगाने की मांग करता रहा है। इस मुद्दे पर दशकों से प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा और मेधा पाटेकर लाखों लोगों के साथ संघर्ष कर रहे हैं। केंद्र के सामने दोनों विषय विकास की राजनीति से जुड़े हुए हैं। गांव को शहरों में बदलने के पीछे खनन का अहम योगदान है।

खनन का काम भी ऊंचे ओहदों पर बैठे राजनेता और पूंजीपतियों द्वारा होता है। यहां तक कि हर चुनाव से पहले खनन के पट्टे खोलना और आवंटित करना चुनावी राजनीति का हिस्सा है। नदियों के प्रवाह को रोककर बिजली घर बनेंगे, तो उससे निकलने वाली रोशनी से सराबोर हो जाना सब पसंद करते हैं।

लेकिन बांध निर्माण के ठेके और भ्रष्टाचार जगजाहिर है। परिणाम स्वरूप बांध विरोधी और समर्थक दो धारायें जन्म लेती हैं। फैसला अंत में में समर्थकों के हित में जाता है। नेता और नौकरशाह, जिनसे हम पर्यावरण के लिए हानिकारक परियोजनाएं रुकवाने की बात करते हैं, वे तो पहले ही समर्थकों की पंक्ति में खडे़ नजर आते हैं। 

प्रकृति और मानव के बीच संतुलित जीवन

भले ही देश में ऊर्जा क्षेत्र के लिए सौर और अन्य वैकल्पिक स्रोतों को विकसित करने के लिए पहले की अपेक्षा अधिक सफलतम काम हो रहा है। इसके बावजूद अनेकों नदियों पर हर रोज बांधों के निर्माण के लिये सरकारों और ऊर्जा कंपनियों में समझौते हो रहे हैं।

गंगा की बर्बादी को रोकने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर चुके स्वामी सानंद ने राष्ट्रीय नदी गंगा के संरक्षण, सुरक्षा, प्रबंधन बिल, 2012 का मसौदा तैयार किया था। उन्होंने इसे एनडीए सरकार के सामने रखा जिसमें वर्ष 2018 में बदलाव करके मूलभूत बातों से किनारा कर लिया गया। अब इस मुद्दे पर मातृसदन के परमाध्यक्ष स्वामी शिवानंद और उनके शिष्य लगातार अनशनरत हैं। 

संतों की मांग है कि गंगा में कोई भी गंदगी न उड़ेली जाए, गंगा के तटों पर ठोस अपशिष्ट को जलाने, प्रदूषणयुक्त कारखाना, वन कटान, खनन, रिवर फ्रंट और रासायनिक प्रदूषण पर पूरी तरह रोक लगे। गंगा को बांधों से मुक्ति दिलाई जाए। गंगा को नैसर्गिक, विशुद्ध रूप देने के लिये प्रयास करने का सुझाव दिया है।

गंगा के विशेष गुणों जैसे- सड़नमुक्त, रोगनाशक, स्वास्थ्यवर्धक जल की रक्षा अविरल प्रवाह के कारण ही हो सकती है। संतो की ये बातें भले ही आधुनिक विकास के सामने एकतरफा दिखाई देती हो, लेकिन प्रकृति और मानव के बीच संतुलित जीवन जीने का यही एक रास्ता हैं। 
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