मातृसदन के संतों द्वारा गंगा रक्षा के लिए दिए जा रहे इस बलिदान के प्रति सरकार गंभीर है? और अगर ऐसा नहीं लगता है, तो राज-समाज के पास इनके लिए किस तरह के न्याय का प्रावधान है। भगीरथ ने कठिन तपस्या करके गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारा था। उन्होंने यह नहीं सोचा होगा कि एक समय ऐसा भी आएगा, जब मोक्षदायिनी गंगा को बचाने के लिए मातृसदन, हरिद्वार के संतों को एक के बाद एक अपना बलिदान देना पड़ेगा।
यह जग-जाहिर है कि मातृसदन के संत प्रदर्शन, हड़ताल, सड़क जाम किए बिना अपना भोजन और पानी त्यागकर अहिंसक रूप में केंद्र और राज्य सरकार से गंगा को निर्मल और अविरल बनाने के लिए सत्याग्रह के रास्ते पर खुद का जीवन न्यौछावर कर रहे हैं।
मोदी सरकार भी नमामि गंगे परियोजना के माध्यम से गंगा की निर्मलता के लिए प्रयत्नशील है। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि ऐसी महत्वाकांक्षी परियोजना के चलते मातृसदन के संतों के बीच से निकल रही गंगा की आवाज को पहचानने का प्रयास नहीं हुआ है।
संतों के अन्न-जल त्याग कर बलिदान होने के जज्बे के प्रति समाज व सरकार को तमाशबीन नहीं बनना चाहिए। गौरतलब है कि मातृसदन में इससे पहले पूर्व आईआईटी प्रोफेसर जीडी अग्रवाल, जो बाद में स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद बने, अक्तूबर, 2018 में 112 दिनों के उपवास के बाद प्राण न्यौछावर कर गए।
इसके पहले वर्ष 2011 में, स्वामी निगमानंद का 115 दिन के उपवास के बाद प्रणांत हो गया। स्वामी आत्मबोधानंद भी दूसरी बार उपवास कर रहे हंै। 15 दिसंबर 2019 से अनशनरत मातृसदन की अनुयायी साध्वी पद्मावती अंतिम सांस लेने की स्थिति में हैं।
संतों द्वारा गंगा रक्षा के लिए दिए जा रहे इस बलिदान के प्रति सरकार गंभीर है? और अगर ऐसा नहीं लगता है, तो राज-समाज के पास इनके लिए किस तरह के न्याय का प्रावधान है। ऐसा इसलिए क्योंकि, मातृसदन के दो संतों के बलिदान के बावजूद साध्वी पद्मावती के प्राणों को बचाने के प्रयास नजर नहीं आ रहे हैं।
यूपीए सरकार के समय भी स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद ने पांच बार उपवास किया था, तब वर्ष 2013 में, तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उन्हें आश्वासन दिया था, कि केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद उनकी सारी मांगें मान ली जाएंगी। एनडीए की सरकार बनने के बाद वह अपनी आवाज उठाते रहे, पर पिछले साल एक उपवास के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।