हमारे यहां पिछली शती के पूर्वार्ध में जब फिल्म कला में लोग सक्रिय हुए, तो महाराष्ट्र के फिल्मकारों ने अपनी फिल्मों का विषय उन संतों के जीवन को ही चुना था, जिन्होंने महाराष्ट्र समेत पूरे देश को अपने आध्यात्मिक मूल्यों से सींचा था। इन फिल्म कंपनियों में प्रमुख भूमिका थी, प्रभात फिल्म कंपनी की, जिसने धर्मात्मा (एकनाथ के जीवन पर, 1935), संत तुकाराम (1936), संत ज्ञानेश्वर (1940), संत सखू बाई (1941) और संत जना बाई (1949) जैसी अमूल्य कृतियां बनाईं। वी शांताराम, विष्णुपंत दामले, शेख फतेलाल, राजा नेने और गोविंद घाणेकर इन्हीं कृतियों से जाने गए। नई शती में नामदेव, चोखोबा और कान्हो पात्रा पर भी फिल्में बनीं।
मराठी संतों के पदों को संगीत के माध्यम से प्रस्तुत करना ही महाराष्ट्र की अभंग गायिकी है। बाल गंधर्व, भीमसेन जोशी, कुमार गंधर्व और न जाने कितने गायकों ने नाट्य संगीत में अभंग गाकर इन संतों के शब्द मर्म को जन-जन के हृदय तक पहुंचाने की महान कोशिश की है। भीमसेन जोशी के पुणे स्थित घर पर 1994 में सामता प्रसाद मिश्र के तबला वादन का एक घरेलू कार्यक्रम रखा गया था, लेकिन उससे पहले भीमसेन जी ने हमें एक अभंग सुनाया, अगा वैकुंठीजा राया। उस अभंग के प्रति हम सभी का प्रेम इतना जागा कि हमने एक और अभंग सुना, पतित तू पावना। उन्होंने बताया कि यह पद कान्हो पात्रा का है। यह नाम सुनते ही कुमार गंधर्व याद आ गए, जिनकी अब जन्म शतवार्षिकी मनाई जानी है, जिन्होंने 1991 में अपने काशी प्रवास के दौरान नामदेव के शिष्य संत चोखामेला या चोखोबा के बारे में बताया था और उनका एक पद हमें बातचीत के दौरान ही गाकर सुनाया था, जोहार मायबाप जोहार। उन्होंने बताया था कि इसका संगीत कान्हो पात्रा ने रचा था।
इस प्रसंग में दो प्रश्नों पर विचार करने की जरूरत है। इन विषयों की संगीत नाट्य प्रस्तुतियों से सामान्य और विशिष्ट जनों का सत्संग और उपनिषद तो होता है, देर तक असर भी रहता है। लेकिन ऐसी जन जागृति के शताब्दी प्रयासों के बावजूद व्यक्ति संत के गुणों को जीवन में ढालकर स्वयं संत क्यों नहीं बन पाता, वह अनुयायी ही क्यों बना रह जाता है? व्यक्ति तर्क देता है कि संसार में रहने के कारण संसार नहीं छूट पाता। लेकिन संत भी तो इस संसार में ही रहते थे। और दूसरा प्रश्न यह कि रंगमंच पर ऐसे संतों का अभिनय कैसे किया जाए। अब तक इनके चरित्र को दिखाने की कथामूलक पारंपरिक कोशिशें ही होती रही हैं। नाट्यशास्त्रीय ढंग की कभी कोई कोशिश नहीं देखी गई।
सभी संतों और ग्रंथों ने एक बात महत्व की बताई है कि सत्य पर आवरण है, धूल है। व्यक्ति को सिर्फ यह धूल हटानी है। जब भी हम संत समागम करते हैं, उनके विचार पढ़ते या सुनते हैं, धूल की परत और मोटी हो जाती है, अहंकार और बढ़ जाता है। हम या तो पाखंडी हो जाते हैं या अनुयायी बनकर रह जाते हैं। धूल हटते ही हम कान्हो पात्रा हैं, कबीर हैं, मीरा हैं, सूर हैं, जना बाई हैं। सखू बाई या जना बाई जैसी संत का अभिनय भी शास्त्रवर्णित है, जिन्होंने किसी का अनुकरण न कर सिर्फ उस धूल को हटाया, जो उसके और उसके विट्ठल के बीच जमा था। और धूल जमा न करना जब सत्य का सहज साक्षात्कार है, तब हर व्यक्ति चैतन्य है।