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लौटना हमें जोड़ता है: वापसी से जीवन का एहसास, इससे आशा और भरोसा बंधे होते हैं

Nanditesh Nilay
Updated Mon, 14 Apr 2025 04:57 AM IST

सार

कोई पृथ्वी पर लौटा, तो कोई अपने वतन। कोई अपने शहर, तो कोई अपने गांव। भारत के अधिकांश शहरों में शाम के बाद सभी घर लौटना चाहते हैं। सभी को किसी के लौटने का प्रतिदिन इंतजार रहता है। लौटना मानो अपने साथ वह जीवन लिए आता है, जिससे आशा और भरोसा बंधा होता है।
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अंतरिक्ष से सकुशल वापसी के बाद सुनीता विलियम्स - फोटो : अमर उजाला / एजेंसी


इतिहास उनके लौटने की कहानी लिख रहा था। हां, यह और बात है कि जब वह अंतरिक्ष यान ड्रैगन वायुमंडल के संपर्क में आया, तब वह छह मिनट के ब्लैक आउट में फंस गया और उससे सारे संपर्क भी टूट गए। नासा की टीम को उस ब्लैक आउट के बारे में जानकारी थी। वह जानते थी कि जब  वायुमंडल के संपर्क में एकाएक यान आता है, तो कुछ मिनटों के लिए संचार साधनों से संपर्क टूट-सा जाता है। इस सच्चाई को जानने के बावजूद उन्हें कल्पना चावला और उस कोलंबिया यान की दुर्घटना का सत्य तो पता ही था। तभी वह यान राडार पर नजर आने लगा। और फिर से उस लौटने की उड़ान को, उन लाखों लोगों के इंतजार को हौसला मिला और सुनीता विलियम्स सुरक्षित लौट आईं।


ऐसे में प्रश्न यह है कि क्या लौटना भी एक प्रयोजन होता है? सबकुछ हासिल करने के बाद वापस लौटना क्या मनुष्य के लिए उपलब्धि सदृश होता है? लक्ष्य बनाती और भेदती दुनिया में पहुंचने से ज्यादा कई बार क्या लौटना महत्वपूर्ण होता है? हम सभी आगे बढ़ते जाते हैं। कोई पीछे मुड़ना नहीं चाहता। लेकिन लौटना तो प्रकृति का नियम है। पक्षी भी लौटते हैं, और अगली सुबह सूरज भी। और यह भी कि लौटना, न्यूटन के थर्ड लॉ के सदृश, उस कर्म-फल के सिद्धांत की तरह होता है। सुनीता विलियम्स को तो लौटना ही था, ऐसा लोग कह सकते हैं, क्योंकि वह स्पेस में कैसे रह सकती थीं? लेकिन अंतरिक्ष में नौ महीने तक जिस हौसले और जिजीविषा से वह रहीं, करीब 900 घंटे रिसर्च किया और जिस तरह हमेशा उनका चेहरा हंसता रहा, मानो यह बताता हो कि वह अपने कर्म के प्रति प्रतिबद्ध हैं। ऐसे साहस के साथ उनके लौटने की यात्रा ने 'लौटने' को भी उतना ही महत्वपूर्ण बना दिया।


चलिए, इस लौटने की कहानी को थोड़ा पीछे मुड़कर देखते हैं। कोविड के समय उन लाखों लोगों ने अपने कर्म क्षेत्र को छोड़कर अपने जन्म क्षेत्र या अपने माता-पिता के पास लौटना उचित समझा। मृत्यु तो दोनों तरफ मुंह बाए खड़ी थी, लेकिन महामारी उन हौसलों को लौटने से न तोड़ सकी और न उस यकीन को भी, जो उन असंख्य बढ़ते कदमों को यह आभास दे रहा था कि उनके गांव-घर में कोई न कोई उनका इंतजार कर रहा होगा। बिना गूगल मैप के उन कदमों से हजारों किलोमीटर की यात्रा कुछ पाने के लिए नहीं हुई थी, बल्कि यह बताने के लिए कि लौटना एक आशा है, और उस इंतजार से जुड़ने की वह यात्रा है, जो परिवार और समाज के वजूद का एहसास भी कराते हैं। और ऐसा रिटर्न शायद ही इतिहास ने कभी देखा होगा। 


आखिर हम सभी प्रतिदिन किसी न किसी के लौटने का इंतजार तो करते ही हैं। कई बार हमारे पहुंचने से भी ज्यादा हमारे लौटने की अहमियत हो जाती है। कोई समझता है, तो कोई नहीं समझता। लौटना हमंे यकीन दिलाता है कि कोई हमारा इंतजार कर रहा है। लेकिन इस देश में ऐसे कितने माता-पिता हैं, जो अपने बच्चों को बाहर पढ़ने और नौकरी करने के लिए भेजते हैं, तो कई बार यह सोचते होंगे कि क्या उनके बच्चे कभी वापस भी लौटना चाहेंगे? कोई लौटता है, तो कोई नहीं। कितने माता-पिता की आंखें इंतजार में पथरा-सी जाती हैं और कितनों की सांसें आखिरकार ठहर जाती हैं। शायद नहीं लौटना कई बार हमे निष्ठुर भी बना देता है। हम किसी और देश में रहकर अपने देश का नाम तो करते हैं, पर कहीं न कहीं वापस लौटने का भाव कुछ कम-सा होने लगता है।


लेकिन उस डॉक्टर को यह मंजूर नहीं था कि अब वह एक भी दिन ज्यादा अमेरिका में रुके। उसके पिता ने उसे आवाज उस खत के माध्यम से दी थी, जो लौटने का हौसला दे बैठा, जो कितनों के पास नहीं होता। और उससे भी बड़ी बात यह मानना कि उसके पिता उनका इंतज़ार कर रहे हैं। अपनी फेयरवेल पार्टी में जब उस डॉक्टर के सीनियर ने उसको भारत लौटने के फैसले पर फिर से सोचने को कहा, तो उसने जवाब दिया, 'पिता के आदेश को महसूस करने के लिए भारत में जन्म लेना होगा।' और इस तरह अपोलो हॉस्पिटल के मालिक प्रताप चंद्र रेड्डी भारत लौटते हैं। कोई पृथ्वी पर लौटा, तो कोई अपने वतन। कोई अपने शहर, तो कोई अपने गांव। भारत के अधिकांश शहरों में शाम के बाद सभी घर लौटना चाहते हैं। सभी को किसी के लौटने का प्रतिदिन इंतजार रहता है। लौटना मानो अपने साथ वह जीवन लिए आता है, जिससे आशा और भरोसा बंधा होता है। लौटने का मूल्य संसदीय प्रजातंत्र का भी वह भरोसा है, जहां जनता चुनाव के बाद अपने प्रतिनिधियों का निर्वाचन क्षेत्र में भी लौटने का इंतजार करती है।


लौटने और इंतजार के मूल्य का अनोन्याश्रय संबंध है, और शायद यहीं से वह हौसला भी मिलता है, जो लौटने के पैराशूट को दिशा देता है। सुनीता विलियम्स के लिए अंतरिक्ष कर्म क्षेत्र बना और पृथ्वी उनका घर। इसलिए पूरी पृथ्वी को उनका इंतजार रहा। जो भी हो, सुनीता विलियम्स के लौटने की घटना ने न जाने कितने लोगों को फिर से अंतरिक्ष के सपनों से जोड़ दिया। ऐसी बनती दुनिया में, जहां कोई रोबोट रो या हंस नहीं सकता, लौटना हमें उन भावों से जोड़ता है, जहां कोई किसी का इंतजार खुशी से चमकती उन नम आंखों से कर रहा होता है। ऐसा ही कुछ सुनीता विलियम्स को भी अपने घर पृथ्वी पर लौटने पर महसूस हुआ। सभी उनका इंतजार कर रहे थे। क्या अपने, क्या पराए। लौटना सभी को जोड़ देता है। और उस दिशा में मुड़ने को कहता है, जिधर घर पड़ता है। हिंदी के महान साहित्यकार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल का वह कथन याद आ जाता है, घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता, जितना लौटने के लिए होता है।

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