स्वतंत्रता आंदोलन में कई ऐसे प्रसंग हैं, जो हमें सिखाते हैं कि मातृभूमि की सेवा का कोई भी अवसर नहीं छोड़ना चाहिए। पग-पग पर अपनी जन्मभूमि को सम्मान देने वाला व्यक्ति हमेशा सम्मान पाता है। ऐसे ही व्यक्ति थे, महान देशभक्त क्रांतिकारी भाई परमानंद जी।
अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह के आरोप में उन्हें कालापानी (अंडमान की जेल में) भेज दिया गया और अनेक वर्षों तक यातनाएं दी गईं। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती भाग्य सुधिदेवी ने पति के जेल जाने के बाद आर्थिक संकटों के बावजूद पुत्र तथा पुत्री का अत्यंत स्वाभिमान के साथ मेहनत करके पालन-पोषण किया था।
भाई परमानंद जी जब जेल से रिहा हुए, तो उनके प्रति श्रद्धा रखने वालों ने सहायता के रूप में 20 हजार रुपये एकत्र किए और भाई जी के पास पहुंचकर थैली उनके सामने रख दी। भाई जी ने पूछा, इसमें क्या है? उन्हें बताया गया कि इसमें 20 हजार रुपये हैं। श्रद्धा निधि के रूप में वे उन्हें भेंट करने आए हैं।
भाई जी ने विनम्रता के साथ राशि लेने से मना करते हुए कहा, मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्ष में भाग लेकर मैंने कोई नया कार्य नहीं किया है। मेरे वंश के भाई मतिदास ने धर्म-स्वातंत्र्य के लिए अपने शरीर को आरे से चिरवा दिया था। मेरा त्याग तो उनके सामने कुछ भी नहीं है। और भाई जी ने राशि लौटाते हुए कहा, इसे अनाथ आश्रम को दान कर देना।