शौकिया अपराध करने वालों की वजह से पेशेवर अपराधियों की ही नहीं, पुलिस की भी बेइज्जती होती है। कुछ है नहीं करने को तो चलो, अपराध ही कर लेते हैं। इन्हीं चलताऊ अपराधियों की वजह से थाने का रेट आज इतना बढ़ गया है कि लगता है, पेशेवर अपराधी के बजाय यदि थानेदार ही होते, तो ठीक रहता। बचता ही नहीं है कुछ!
पेशेवर अपराधी कभी जेल से या थाने से नहीं भागते, यह उनकी पक्की पहचान है। सिपाही नींद निकाल ले, घर के कामकाज निपटा आए या बाई सा’ब (थानेदार की पत्नी का सरकारी नाम) के कहने पर बच्चों को सिनेमा छोड़ आए, पर मजाल कि अपराधी इधर से उधर भी हो जाए।
बगैर हथकड़ी और रस्सी के पेशेवर अपराधी बैठा रहता है। ज्यादा से ज्यादा ठेले तक चाय-बीड़ी पीने चला जाता है या फिर यार-दोस्त आ जाते हैं, तो बतिया लेता है। ऐसा भी नहीं है कि जरूरी काम आ जाए, तो भी वह जेल में ही बैठा रहता है। बताकर जाता है। कहकर जाओ, तो पुलिस वाले भी निश्चिंत रहते हैं कि कहां जाएगा, आ जाएगा।
जब ऐसी आपसी समझ-बूझ का माहौल है, तो फिर जेल से भागना क्यों? पुलिस वाले भी आखिर कितना बर्दाश्त करें। जेल में ऐसा क्या नहीं है, जो बाहर है। इधर कहा, पैसा दिया और उधर सारी चीजें हाजिर! पुलिसवाले भी अपराधी की मनुहार मान लेते हैं। वैसे भी अकेले खाना किसे अच्छा लगता है।
खासकर पेशेवर अपराधी तो अपने वालों के साथ ही खाते-पीते हैं। अब जेल में यार-दोस्त कहां से आएं! तो थाने के पुलिसवालों की कंपनी चल जाती है। बदनाम करते हैं लोग कि पुलिस अच्छा बर्ताव नहीं करती। थाने पर आकर पेशेवर अपराधियों के साथ चार पल गुजारकर तो देखो। भूल जाओगे कि ये पुलिस वाले हैं या समाज सुधारक।
ये शौकिया अपराधी एक तो फौरन पकड़ लिए जाते हैं, और चार झापड़ में ही उन्हें नया काम नजर आने लगता है। धंधे में आए हो, तो उसके नियम तो पता करो। पुलिस को परेशान करोगे, तो क्या वह आपको चैन से रहने देगी? आपका चैन इसी से तय होता है कि पुलिस को आप कितना चैन लेने दे रहे हैं।
इसीलिए कहा है कि अपना धंधा शुरू करने से पहले किसी जानकार की राय ले लेनी चाहिए। अपराध यदि इतना ही आसान होता, तो लोग पुलिस में क्यों भर्ती होते। धंधे का आप मान रखोगे, तभी तो बरकत आएगी।