2026 की पहली छमाही में यूक्रेन ने रूसी रिफाइनरियों पर 194 ड्रोन हमले किए। मॉस्को की कपोत्न्या रिफाइनरी दो बार जली, जो राजधानी का 40 फीसदी पेट्रोल बनाती थी। रूस की कुल रिफाइनिंग क्षमता का 25 फीसदी ठप। 6,000 परमाणु हथियारों वाला देश दूध के टैंकर में ईंधन छिपा रहा है। जंग ने क्या हाल कर दिया रूस की ताकत का। टाइम मशीन के मुसाफिरो, यह कहानी नई नहीं है। जब भी किसी जंग में ईंधन खत्म हुआ है, दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाएं, सबसे बड़े टैंक, सबसे तेज जहाज, सबसे बहादुर सैनिक सब रुक गए हैं, क्योंकि बिना ईंधन टैंक लोहे का ताबूत है। आइए, चलते हैं रूस के अतीत में। सितंबर 1812। टाइम मशीन मॉस्को पर मंडरा रही है।
उधर देखिए, नेपोलियन की सेना एड़ियां रगड़ रही है। इस जमाने में तेल नहीं है, मगर ईंधन चाहिए-वह है, अनाज, चारा, घास, पानी। घोड़े भूखे, तो तोपों को कैसे खींचा जाएगा? सैनिक भूखे, तो बंदूकें कौन उठाएगा? सामने इतिहास की सबसे बड़ी सेना है। नेपोलियन की ग्रैंड आर्मी। छह लाख सैनिक। बारह देशों की मिली-जुली ताकत। रूस ने उसे आते देखा, तो वह किया, जो कोई नहीं करता-अपना ही देश जलाया। खेत जलाए, कुएं में जहर डाले, गोदाम खाली किए। फ्रांसीसी सेना को एक दाना न मिला। नेपोलियन मॉस्को पहुंचा। शहर खाली। जला हुआ। रूसियों ने अपनी राजधानी में खुद आग लगा दी-दुश्मन को छत भी न मिले। खाना नहीं। चारा नहीं। घोड़े मरने लगे। तोपें सड़कों पर छोड़ीं। सर्दी आ गई। सैनिक मरे हुए घोड़ों के पेट में से आंतें निकालकर उसमें घुस जाते, ताकि सर्दी से बच सकें। अब नेपोलियन लौट रहा है। छह लाख गए। एक लाख लौटे। नेपोलियन को किसी जनरल ने नहीं हराया-भूख और ठंड ने हराया। उसका ईंधन खत्म हो गया था। 1812 में रूस ने ईंधन इसलिए जलाया कि हमलावरों को न मिले। 2026 में रूस ने जिस पर हमला किया, वह जवाबी हमले में रूस का ईंधन जला रहे हैं।
अब टाइम मशीन दूसरे विश्वयुद्ध के बीचोंबीच आ गई है। दिसंबर 1941। टोक्यो। जापान 80 फीसदी तेल अमेरिका से खरीदता है। जुलाई 1941 में रूजवेल्ट ने तेल बंद कर दिया। ब्रिटेन व नीदरलैंड्स ने साथ दिया। जापानी नौसेना के एडमिरलों ने हिसाब लगाया-18 महीने का भंडार है। उसके बाद? युद्धपोत बंदरगाह में सड़ेंगे। विमानवाहक पोत लोहे के टापू बनेंगे। जापान बिना लड़े हार जाएगा। जापान की सेना के अफसर बता रहे हैं कि एडमिरल इसोरोकू यामामोटो ने सम्राट से कहा, ‘दो रास्ते हैं। या अमेरिका की शर्तें मानो, चीन से हटो, इंडो-चाइना छोड़ो। या फिर, पहले अमेरिकी बेड़ा तबाह करो और फिर डच ईस्ट इंडीज का तेल छीनो। मैं छह महीने से एक साल तक अमेरिका के खिलाफ लड़ सकता हूं। उसके बाद कोई गारंटी नहीं।’
टाइम मशीन की स्क्रीन पर देखिए। सात दिसंबर, 1941। पर्ल हार्बर। टाइम मशीन अगली मंजिल की तरफ बढ़ती है। इस बीच आप सोचिए कि पूरा पैसिफिक वार। मिडवे। इवो जीमा। ओकिनावा। हिरोशिमा। नागासाकी। लाखों मौतें। यह सब एक तेल प्रतिबंध से शुरू हुआ। जापान ने जंग इसलिए नहीं छेड़ी कि उसे कोई देश जीतना था, बल्कि इसलिए कि तेल के बिना मरना नहीं था। 1942। सामने लीबिया का रेगिस्तान। एक आदमी टैंक के ऊपर खड़ा है। धूल भरा चेहरा। दूरबीन। एर्विन रॉमेल। जर्मनी फील्ड मार्शल। लोग उसे ‘रेगिस्तानी लोमड़ी’ कहते हैं। रॉमेल ने ब्रिटिश सेना को पीछे धकेलते हुए मिस्र की सीमा तक पहुंचा दिया है। एक और धक्का, फिर काहिरा गिरेगा तथा स्वेज नहर हिटलर की होगी। अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्य का गला कट जाएगा। मगर यह क्या? ध्यान से देखिए, रॉमेल का अभियान रुक गया है, क्योंकि ईंधन नहीं है। खबर आई है कि माल्टा से उड़े ब्रिटिश लड़ाकू विमान और पनडुब्बियां रॉमेल के सप्लाई जहाज डुबा रहे थे। इधर रॉमेल के टैंक खाली खड़े हैं। रॉमेल ने बर्लिन को बार-बार तार भेजे हैं-‘ईंधन भेजो! ईंधन भेजो!’ हिटलर का जवाब, ‘पूर्वी मोर्चे पर ज्यादा जरूरी है।’ रॉमेल अपनी डायरी में लिखेगा और यह वाक्य हर सैन्य अकादमी में पढ़ाया जाएगा कि ‘बहादुर से बहादुर आदमी बंदूक के बिना कुछ नहीं कर सकता। और बंदूक बेकार है, अगर ईंधन भरी गाड़ी नहीं है, जो उसे ले जाए।’ काहिरा का दरवाजा खुला है। रॉमेल के पास चाबी है। मगर चाबी घुमाने का ईंधन नहीं है।
नेपोलियन के छह लाख सैनिकों को रूस ने आते देखा, तो वह किया, जो कोई नहीं करता-रूसियों ने अपनी राजधानी में खुद आग लगा दी-दुश्मन को छत भी न मिले। खाना नहीं। चारा नहीं। घोड़े मरने लगे। तोपें सड़कों पर छोड़ीं। सैनिक मरे हुए घोड़ों के पेट में से आंतें निकालकर उसमें घुस जाते, ताकि सर्दी से बच सकें। नेपोलियन को किसी जनरल ने नहीं हराया-भूख और ठंड ने हराया। उसका ईंधन खत्म हो गया था।
अब टाइम मशीन 1942-43 के स्टालिनग्राड में है। यहां इतिहास का सबसे खूनी युद्ध हुआ है। बीस लाख हताहत। मगर यहां हिटलर आया ही क्यों? जंग सिमट रही है, तो पता चला है कि उसे चाहिए था बाकू। कैस्पियन सागर का किनारा। सोवियत तेल का 80 फीसदी वहीं से आता था। स्टालिनग्राड वोल्गा नदी पर बाकू का दरवाजा है। हिटलर का हिसाब सीधा था-दरवाजा तोड़ो, बाकू का तेल लो, अपनी सेना का पेट भरो, जंग जीतो। स्टालिन समझ गया। उसने ऑर्डर 227 जारी किया-एक कदम भी पीछे नहीं। पीछे हटने वाले को गोली। और यह सब किसलिए? तेल के लिए। बाकू का तेल अगर हिटलर को मिल जाता, तो दूसरा विश्वयुद्ध ऐसे खत्म नहीं होता। स्टालिनग्राड ने वह दरवाजा टूटने नहीं दिया।
यह 1943-44 है। मित्र राष्ट्रों ने तय किया कि अब हिटलर की नस काटो, यानी ईंधन। पहला निशाना-प्लोएश्ती। रोमानिया का तेल क्षेत्र। जर्मनी के पास अपना तेल नहीं था। प्लोएश्ती से आता था। एक अगस्त, 1943। आपकी स्क्रीन पर-178 अमेरिकी बी-24 बमवर्षक ने ऑपरेशन टाइडल वेव का एलान कर दिया है। 660 वायुसैनिक मारे गए। मगर प्लोएश्ती पूरा नहीं टूटा। 1944 में ‘ऑयल कैंपेन’ शुरू हुआ। अब निशाना बदला-जर्मनी के सिंथेटिक ईंधन संयंत्र। हिटलर ने कोयले से पेट्रोल बनाने की फैक्टरियां लगाई थीं-फिशर-ट्रॉप्श तकनीक। 1944 तक लुफ्टवाफे के विमानों का 90 फीसदी ईंधन इन्हीं फैक्टरियों से आता था। ल्यूना, ब्रक्स, पोलिट्ज-एक-एक करके मित्र राष्ट्रों ने तबाह किया। और फिर वह हुआ, जो हर फील्ड मार्शल का बुरा सपना है। टाइगर टैंक सड़कों पर खड़ा रह गया। ईंधन नहीं था, तो दुनिया का सबसे खतरनाक हथियार लोहे का बुत बन गया। दुनिया का पहला ऑपरेशनल जेट लड़ाकू विमान हैंगर से निकला ही नहीं। पायलट तैयार, हवाई पट्टी तैयार, पर ईंधन की एक बूंद नहीं। और जापान? अप्रैल 1945। यामातो जापान का सबसे बड़ा युद्धपोत था। उसे ओकिनावा भेजा गया। मगर वापसी का ईंधन नहीं। एकतरफा टिकट। तीन हजार नाविक जानते थे, लौटना नहीं है। अमेरिकी विमानों ने रास्ते में ही डुबो दिया। यामातो ओकिनावा भी नहीं पहुंचा। अल्बर्ट स्पेयर, यानी हिटलर के हथियार मंत्री ने नूरेमबर्ग में गवाही दी: ईंधन पर बमबारी ने जंग छह महीने छोटी कर दी।
टाइम मशीन वापस लौट रही है। रूस वापस लौट रहा है। पुतिन की 21 रिफाइनरियां जख्मी हैं। उधार का डीजल मजबूती है। सबसे बड़ी सेना, खतरनाक हथियार, बहादुर सैनिक, सब बेकार, अगर ईंधन नहीं है। हो सकता है, कल रूस का कोई जनरल गवाही दे कि पुतिन का रूस उसी दिन हारने लगा था, जिस दिन रिफाइनरी जल उठी थीं। फिर मिलते हैं अगले सफर पर...