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ग्रामीण किशोरियां ला रही हैं बदलाव : प्रौद्योगिकी ने दुनिया ही नहीं, विकास की परिभाषा को भी बदला

नीराज गुर्जर
Updated Tue, 22 Nov 2022 07:27 AM IST

सार

महिला जन अधिकार समिति की संस्थापक सदस्य इंदिरा पंचोली बताती हैं कि जिन गांवों में लड़कियों के लिए फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी हो और आर्थिक दंड की व्यवस्था हो, वहां डिजिटल संसाधन पूरी तरह लड़कियों के नियंत्रण में देना संस्था के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : सोशल मीडिया


इस संदर्भ में निजी क्षेत्रों, विशेषकर गैर सरकारी संस्थाओं की भूमिका सराहनीय है। इनके प्रयासों से देश के उन ग्रामीण क्षेत्रों की किशोरियां भी डिजिटल रूप से सशक्त हो रही हैं, जिन्हें रूढ़िवादी विचारधारा का वाहक समझा जाता है। जहां समाज और संस्कृति के नाम पर महिलाओं को घर की चारदीवारियों में कैद रखा जाता है, उनके बचपन का गला घोंटकर शादी के बंधन में बांध देना आम बात होती है। इस कड़ी में राजस्थान का नाम प्रमुख रूप से लिया जा सकता है, लेकिन अब डिजिटल संसाधनों की पहुंच ने इस रूढ़िवादी विचारधारा को बहुत हद तक खत्म कर दिया है। 


राज्य के कई ऐसे ग्रामीण क्षेत्र हैं, जहां सामाजिक संस्थाएं आगे बढ़कर ग्रामीण क्षेत्रों की किशोरियों को डिजिटल रूप से सशक्त बना रही हैं। अजमेर की एक सामाजिक संस्था महिला जन अधिकार समिति में चल रहे टेक सेंटर ने अलग-अलग कार्यक्रमों के जरिये अब तक जिले के ग्रामीण क्षेत्रों की करीब 2,000 से भी अधिक किशोरियों को डिजिटली शिक्षित किया है। इन कार्यक्रमों में डिजिटल किशोरी बने सक्षम–कंप्यूटर लर्निंग कार्यक्रम, ग्रासरूट्स जर्नलिज्म एवं ईच वन टीच टेन-मोबाइल लर्निंग जैसे महत्वपूर्ण कोर्स शामिल हैं। 


इस संबंध में सेंटर की युवा प्रशिक्षक मेरी सदुमहा और कामिनी कुमारी बताती हैं कि ये सभी कोर्स तकनीक लर्निंग के साथ ही स्त्रियों के सशक्तीकरण पर आधारित हैं, जिसमें लड़कियां न सिर्फ तकनीकी ज्ञान हासिल करती हैं, बल्कि अपने बारे में फैसले लेने में और अपने अधिकारों के बारे में भी सीखती हैं। इस संबंध में सेंटर पर प्रशिक्षण प्राप्त कर रही पदमपुरा गांव की 19 वर्षीय माया गुर्जर बताती हैं, 'संस्था द्वारा पत्रकारिता कोर्स के लिए मुझे साल 2021 में स्मार्टफोन दिया गया था। 


यह पहली बार था, जब मैंने किसी फोन को इतने करीब से छूकर देखा और उसे चलाया था। उस समय मुझे ऐसा लगा, मानो मैं एक नई दुनिया से जुड़ गई हूं।' माया अपने गांव में महिला जन अधिकार समिति द्वारा चलाए जा रहे सखी सेंटर की प्रभारी है। माया की ही तरह अजमेर शहर से करीब 12 किमी दूर अजयसर गांव की रहने वाली 18 वर्षीय मोनिका और मंजू भी सखी सेंटर को संभालती हैं। मोनिका बताती हैं, 'सेंटर से मिलने वाले पैसों से मैंने अपने लिए किस्तों पर एक स्कूटी खरीदी है। और अब मैं आसानी से कॉलेज जाती हूं और कहीं भी आ-जा सकती हूं।' 


संस्था ने नौ सखी सेंटर शुरू किए हैं, जहां किशोरियों को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने के लिए पुस्तकें, लाइब्रेरी और टेबलेट्स व इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध कराए गए हैं। बीच-बीच में लड़कियों के लिए जीवन कौशल, स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि विषयों पर भी कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, ताकि उन्हें सभी स्तरों पर ज्यादा से ज्यादा जागरूक किया जा सके। महिला जन अधिकार समिति की संस्थापक सदस्य इंदिरा पंचोली बताती हैं कि जिन गांवों में लड़कियों के लिए फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी हो और आर्थिक दंड की व्यवस्था हो, वहां डिजिटल संसाधन पूरी तरह लड़कियों के नियंत्रण में देना संस्था के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था। 


वहां इस प्रकार के सेंटर खोलना पितृसत्ता समाज को चुनौती देने के बराबर था, लेकिन इन लड़कियों की अपने जीवन में आगे बढ़ने की आशाएं और चुनौती से जूझने की हिम्मत के कारण ही ये सेंटर सफलतापूर्वक चल पाए हैं। बहरहाल, इन ग्रामीण किशोरियों ने न केवल डिजिटल साक्षरता के महत्त्व को समझा, बल्कि उसे अपने जीवन में भी अपनाया और आज इसी के बलबूते पर ये न केवल अपना खर्च स्वयं उठा रही हैं, बल्कि परिवार की भी मदद कर रही हैं। (चरखा फीचर)

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