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रुपया और संकट: डगमगा रही वैश्विक अर्थव्यवस्था, रणनीतियों पर नए सिरे से करना होगा विचार

अमर उजाला Published by: Pavan Updated Thu, 02 Apr 2026 07:53 AM IST

सार

जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अभूतपूर्व संकट से जूझ रही हो, तब मुद्राओं में गिरावट अस्वाभाविक नहीं। लेकिन एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में रुपये का शामिल होना चिंता बढ़ाता है। ऐसे में, केंद्रीय बैंक को अपनी रणनीतियों पर नए सिरे से विचार करना होगा।
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रुपया और संकट - फोटो : FreePik


जाहिर है कि इसका सीधा असर भारत जैसे देशों की मुद्राओं पर पड़ता है। इसके अलावा, ईरान युद्ध और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है। भारत विश्व की उन अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जो आयातित ऊर्जा पर सर्वाधिक निर्भर है। वह अपने कच्चे तेल की जरूरतों का 85 फीसदी और प्राकृतिक गैस का 40 फीसदी से अधिक आयात करता है। यही वजह है कि तेल की कीमतों में वृद्धि सीधे चालू खाता घाटे को बढ़ाती है, जिससे रुपया कमजोर होता है।


उल्लेखनीय है कि इससे पहले रुपये में ऐसी गिरावट करीब एक दशक पहले 2013 में भी देखी गई थी, पर उस वक्त घरेलू अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार, दोनों आज की तुलना में कमजोर स्थिति में थे। लेकिन यह देखते हुए कि रुपये में पिछले एक वर्ष में करीब 10 फीसदी की गिरावट आई है और यह इस वर्ष एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में से एक है, संकट की गंभीरता समझी जा सकती है। यही नहीं, अगर ईरान के साथ अमेरिका-इस्राइल का युद्ध जारी रहा, तो जैसा ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट भी बताती है, रुपया और कमजोर होकर डॉलर के मुकाबले 100 के स्तर तक भी पहुंच सकता है।


भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल के महीनों में विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर रुपये की तेज गिरावट को थामने की कोशिश बेशक की है, पर इस उपाय की भी सीमाएं हैं, क्योंकि विदेशी मुद्रा भंडार का असीमित प्रयोग संभव नहीं है। हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि देश की विकास दर अब भी ऊंची बनी हुई है। युवा आबादी, डिजिटल बुनियादी तंत्र और स्टार्टअप इकोसिस्टम हमारे मजबूत पक्ष हैं।


जरूरत है इस संकट को अवसर में बदलने की, जिसके लिए संरचनात्मक सुधारों की तरफ ध्यान देना होगा। आयात पर निर्भरता कम करने के लिए ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश व घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन देने से आयात बिल कम किया जा सकता है। रुपये का गिरते जाना गंभीर है, पर अगर अल्पकालिक उपायों के साथ दीर्घकालीन रणनीतियों पर भी ध्यान दिया जाए, तो एक स्थायी समाधान की ओर बढ़ा जा सकता है।
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