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सड़कें, महिलाएं और कड़वी हकीकत: दिल्ली से बिहार तक की घटनाएं पूछ रहीं तीखे सवाल, अंधेरे में डराना कितना आसान?

सार

बिहार के जमुई और दिल्ली के कालकाजी की घटनाएं यह सवाल उठाती हैं कि क्या देश की सड़कें महिलाओं के लिए नहीं रह गई हैं?
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महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले चिंताजनक - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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भारत में सड़कें अब भी महिलाओं की तुलना में पुरुषों की ज्यादा हैं। महिलाएं इनका इस्तेमाल कर सकती हैं, बशर्ते वे सावधान रहें, यदि वे समय पर निकलें और यदि कोई यह निर्णय न ले कि उनकी उपस्थिति ही समस्या है। कम से कम हाल की घटनाओं ने तो इसी कड़वी हकीकत को सामने रखा।

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19 सितंबर को बिहार के जमुई में 10वीं कक्षा का एक छात्र व एक छात्रा कोचिंग क्लास के बाद पहाड़ी की सैर करके लौट रहे थे। रास्ते में युवकों के एक समूह ने उन्हें रोक लिया। उन्होंने दोनों से पूछताछ की, लड़के को धक्का दिया, लड़की को छुआ और घसीटा, उसका वीडियो बनाया। जब दोनों ने वहां से निकलने की कोशिश की, तो युवकों ने उनका पीछा भी किया। यह सब करीब 20 मिनट तक चलता रहा। वीडियो सामने आने तक कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई थी। दो दिन बाद दिल्ली में कालकाजी मंदिर के पास डीडीए पार्क में एक 17 वर्षीय लड़की अपने जन्मदिन पर पुरुष मित्र के साथ मंदिर गई थी। वहां तीन लोगों ने खुद को पुलिसकर्मी बताकर दोनों को रोका। इसके बाद उन्होंने लड़की को खींच लिया और उसके साथ बलात्कार किया। आरोपियों में एक वकील, एक कॉलेज का छात्र और एक प्याज बेचने वाला था। यह दर्शाता है कि अंधेरा होने के बाद कानून और पुलिस की भाषा का इस्तेमाल कर किसी लड़की को डराना और नियंत्रित करना कितना आसान हो सकता है।

घटनास्थल के आसपास के पीजी में रहने वाली छात्राओं ने कहा कि उन्हें उन गलियों से गुजरने में असुरक्षा महसूस होती है। एलएसआर विश्वविद्यालय की छात्राएं सड़कों पर उतरीं। उन्होंने सीसीटीवी कैमरे, पिंक बूथ और बेहतर पुलिसिंग की मांग की। छात्राओं ने नेशनल पार्क रोड के अंधेरे और कम रोशनी वाले हिस्सों की ओर भी ध्यान दिलाया। राजधानी में यह कोई नई बात नहीं है। 2012 में चलती बस में हुए निर्भया गैंगरेप के बाद नए कानून बने, फास्ट-ट्रैक कोर्ट बने और देशभर में विरोध हुआ, लेकिन आज भी दिल्ली में भारत के किसी भी दूसरे शहर के मुकाबले रेप के मामले सबसे ज्यादा दर्ज होते हैं। कानून बदले। स्ट्रीट लाइट, बसें और पुलिस की संख्या बढ़ाने का वादा किया गया। मगर जो चीज काफी हद तक नहीं बदली, वह है शाम ढलने के बाद घर से बाहर निकलने वाली महिला से यह सवाल करना कि आखिर उसे बाहर निकलने की जरूरत ही क्यों पड़ी।
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सरकारी प्रतिक्रिया यह रही कि महिलाओं की सार्वजनिक जगहों तक पहुंच सीमित कर दी जाए। स्थानीय सरकार ने सुरक्षा जांच, ज्यादा लाइट और कैमरे लगाने और सूरज डूबने के बाद पार्कों में प्रवेश पर सख्ती करने का आदेश दिया है। लाइट और कैमरों की जरूरत है, लेकिन शाम ढलते ही पार्क बंद कर देने का मतलब उन्हें सुरक्षित बनाना नहीं है। इससे महिलाओं, देर तक काम करने वालों, छात्राओं और शाम को टहलने के इच्छुक किसी भी व्यक्ति को यह संदेश मिलता है कि सूरज डूबने के बाद पार्क अब उनका नहीं रहा। दरअसल, महिलाओं को घर के अंदर रहने की सलाह देना समस्या का समाधान नहीं है, क्योंकि इससे ध्यान असली समस्या से हट जाता है। जमुई के छात्र कक्षा से घर लौट रहे थे। दिल्ली की लड़की मंदिर से वापस आ रही थी। इनमें से कोई भी देर रात मौज-मस्ती के लिए बाहर नहीं निकला था।

अगर महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर उन्हें सड़कों और सार्वजनिक जगहों से दूर रहने को कहा जाए, तो इसे पूरी तरह सुरक्षा नहीं कहा जा सकता। जिस सड़क पर महिलाएं कोचिंग के बाद सुरक्षित होकर नहीं चल सकतीं और जिस पार्क में शाम के बाद महिला या पुरुष नहीं जा सकते, वे जगहें वास्तव में सार्वजनिक नहीं रह जातीं। जमुई और कालकाजी के वीडियो में एक जैसी सोच दिखाई देती है-महिला का वीडियो बनाओ, उसे डांटो, खुद को पुलिस की तरह पेश करो और फिर उसी महिला से कहो कि उसे घर में ही रहना चाहिए था।

जब तक सरकार सड़कों, पार्कों और कॉलेज के आसपास की गलियों को ऐसी सार्वजनिक जगहों के रूप में नहीं देखती, जहां महिलाएं बिना डर के आ-जा सकें, तब तक लड़कियों को यही महसूस होता रहेगा कि शहर पर उनका अधिकार सिर्फ दिन के उजाले तक ही है। अगर भारतीय सड़कों पर चलने वाली ‘सभी लड़कियों’ के लिए कोई गाइड होती, तो उसमें शायद लिखा होता कि अंधेरा होने के बाद बाहर न निकलें, अकेले न चलें और सिर्फ कार या परिवार के बड़े लोगों के साथ ही बाहर जाएं। लेकिन, ऐसा क्यों होना चाहिए? सड़कें सभी की हैं। महिलाओं के लिए सुरक्षित सड़कें, पर्याप्त स्ट्रीट लाइट और सुरक्षित सार्वजनिक जगहें कोई विशेष सुविधाएं नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरतें हैं।

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