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नई सरकार के लिए रोड मैप

Fri, 30 May 2014 07:30 PM IST
प्रदीप एस मेहता
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महान शक्ति के साथ महान जिम्मेदारी आती है। सो, पूर्ण बहुमत पाने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में बनी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार को जनता से किए वायदे पूरे करने होंगे। इस सरकार को पिछली सरकारों के समान वायदों को पूरा न कर पाने का ठीकरा 'गठबंधन की मजबूरी' पर फोड़ने का मौका नहीं मिलेगा।
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भाजपा अपने घोषणापत्र और नेताओं के भाषणों के रूप में चुनावी एजेंडा प्रस्तुत कर चुकी है। नए प्रधानमंत्री ने अपना दस सूत्री एजेंडा भी प्रस्तुत कर दिया है। अब उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए युद्धस्तर पर, काल करे सो आज कर, आज करे सो अब के मंत्र के साथ काम करने की जरूरत है। काम कठिन होगा, परंतु यदि एक रोडमैप के तहत निष्पादित किया जाए, तो कुछ भी मुश्किल नहीं। हम यहां कुछ सुझाव पर विचार कर रहे हैं, जो नई सरकार को प्राथमिकताएं तय करने के लिए मदद दे सकते हैं।

सरकार समय की कीमत पहचाने और अपने लक्ष्यों को अल्पावधि, मध्यावधि और दीर्घावधि पैमानों पर बांटे। अल्पावधि और मध्यावधि में क्रमशः एक और तीन साल के भीतर किए जा सकने वाले कार्यों को रखा जाए। जिन कार्यों में तीन वर्षों से ज्यादा लगें, उन्हें दीर्घावधि में रखा जाए। पहले की सरकारों ने काफी समितियों का गठन कर विशेषज्ञों की राय लेकर विकास योजनाएं बनाई थीं। दुर्भाग्यवश सरकार उन योजनाओं को अमलीजामा पहनाने में नाकाम रही। एनडीए सरकार को समितियों के गठन से बचते हुए पूर्व विकास योजनाओं और विशेषज्ञों के सुझावों को लागू करना चाहिए। मसलन मुद्रास्फीति दर को कम करने की बाबत नरेंद्र मोदी (तत्कालीन मुख्यमंत्री, गुजरात एवं वर्तमान प्रधानमंत्री) की अध्यक्षता वाली समिति ने वर्ष 2011 में मनमोहन सिंह सरकार को सुझाव दिए थे। उन सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
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इसी प्रकार से अशोक चावला (पूर्व वित्त सचिव एवं प्रतिस्पर्धा आयोग के वर्तमान अध्यक्ष) की अध्यक्षता में बनी समिति ने प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा लाने के लिए सुझाव दिए थे। चावला समिति की रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की गई है। ऐसी अनेक रिपोर्टों का क्रियान्वन लंबित है। सरकार को चाहिए कि ऐसे दस्तावेजों को जनता के समक्ष प्रस्तुत कर उन्हें लागू करे। अल्पावधि के शेष समय में पूर्व समितियों के गैर विधायी सुझाव लागू करने चाहिए। ऐसे सुझावों को लागू करने के लिए कानून पारित करने की आवश्यकता नहीं होती। कार्मिक विभागों में पारदर्शिता, सरकारी कार्य प्रणाली में समन्वय लाना और प्रशासनिक सुधार इनमें प्रमुख हैं। मध्यावधि में ऐसे सुझावों को लागू किया जाए, जिनमें कानून बनाने की जरूरत हो। जैसे भ्रष्टाचार निरोधी कानून को सख्त बनाना, अप्रत्यक्ष करों का सरलीकरण आदि। दीर्घावधि में विधायी और गैर विधायी बदलावों की समीक्षा कर उन्हें बेहतर बनाने की कोशिश करनी होगी।


सामंजस्य और समन्वयता के साथ क्रियान्वन : रोडमैप को लागू करते हुए एनडीए सरकार को पिछली सरकारों की गलतियों से सीखना होगा। पिछली सरकारों ने सुधारों की योजनाएं बनाने में कीमती समय खर्च किया है। हालांकि सुझाव शानदार रहे हैं, वे रिपोर्टों के ढेर में धूल खा रहे हैं। वर्तमान सरकार को नई योजनाएं बनाने से ज्यादा पिछली योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू करना होगा। इसके लिए सरकारी अफसरों के लिए स्पष्ट लक्ष्यों का निर्धारण कर उनकी प्राप्ति के लिए सहयोग करना होगा। इसके साथ ही अफसरों की जवाबदेही तय कर, एवं वरिष्ठता के बजाय योग्यता को पदोन्नति का पैमाना बनाना होगा।

नीतियां बनाने में राज्यों और ग्रामीण इलाकों के नुमाइंदों को शामिल करना जरूरी है। यह नीतियां इन्हीं ग्रामीण इलाकों में लागू की जाएंगी, अंततः नीतियां बनाने में जमीनी हकीकतों की जानकारी आवश्यक है। प्रधानमंत्री यह घोषणा कर चुके हैं कि इस सरकार में राज्य सरकारों की पूर्ण भागीदारी होगी। अपने वायदे पर खरा उतरने की लिए उन्हें योजना आयोग और अंतर-राज्यीय परिषद जैसी संस्थाओं का नए सिरे से सृजन करना होगा।

पिछले काफी समय से सरकारी विभाग, आयोग और नियामक संकीर्ण सोच के साथ अलग-अलग खेमों में रहकर काम कर रहे हैं। फलस्वरूप, एक ही विषय पर बहुतेरे और धुरविरोधी नियम और कानून पारित हो चुके हैं, जो विकास के रास्ते में रोड़े का काम कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, विभिन्न खनिज पदार्थों के लिए अनेक विभाग और नियामक हैं। ऐसे में आवेदकों को सरकारी अनुमोदन पाने के लिए अनगिनत विभागों के चक्कर काटने पड़ते हैं। इससे उनकी स्थिति धोबी का कुत्ता, न घर का, न घाट का जैसी हो जाती है। सरकार को चाहिए की वह नीतियों में समन्वय एवं सामान कार्य करने वाले विभागों और नियामकों की विलय प्रक्रिया का जल्दी से जल्दी शुभारंभ करे।

अगर यह सरकार अपने लिए एक सही रोडमैप बनाने और उसका पालन करने में सफल रहती है, तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि उसे एक दशक तक सत्ता में रहने का मौका मिल सकता है। अतः उसके पास भारत को वर्ष 2030 तक दस खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का सुनहरा अवसर है। अगर एनडीए सरकार विफल रहती है, तो उसके लिए सत्ता में वापसी करना बेहद मुश्किल हो जाएगा और उसकी स्थिति हाथ तो आया, पर मुंह न लगा जैसी हो जाएगी। सरकार के पास इतिहास रचने का मौका है, उम्मीद है, वह इसे बर्बाद नहीं करेगी।
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(लेखक कट्स इंटरनेशनल के महासचिव हैं)
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