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हार के बाद ठीकरा फोड़ना

Thu, 29 May 2014 07:13 PM IST
राजेंद्र शर्मा
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चुनाव नतीजा आने के बाद अब सरकार भी चल रही है। लेकिन चोट खाई पार्टियां हैं कि अब भी हार के बहाने तलाश रही हैं। जिसे देखो, हाथ में ठीकरा लिए घूम रहा है कि कोई अच्छा-सा सिर पा जाऊं और अपना ठीकरा फोड़कर निश्चिंत हो जाऊं। अब उत्तर प्रदेश का ही किस्सा ले लीजिए। बहनजी को दूसरा कोई उपयुक्त सिर नहीं मिला, तो संगठन के ही सिर पर ठीकरा फोड़ दिया। एक बार में सारी इकाइयां भंग।
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नेताजी की किस्मत इस मामले में अच्छी निकली। कम से कम ठीकरा फोड़ने लायक सिर मिल तो गए। पैंतीस मंत्री के दर्जेवालों के सिर मिलकर एक ठीकरा फोड़ने लायक तो होते ही हैं। सामूहिक रूप से उनके सिर पर ठीकरा फोड़ दिया। जब बहनजी ने पूरे संगठन पर ठीकरा फोड़ दिया, तब नेताजी कैसे पीछे रह जाते? उन्हें भी संगठन की सारी इकाइयां भंग करनी पड़ीं। उधर जया अम्मा के सामने कब कोई खड़ा हो सकता है! सीटें जीतीं ज्यादा, हारीं बहुत कम, सो हार का ठीकरा फोड़ने के लिए खोपड़ी भी जरा छोटी ही चुनी। सरकार के तीन मंत्री, छह जिला अध्यक्ष, बस! वैराइटी की वैराइटी और अनुपात का अनुपात।

लेकिन, इससे कोई यह न समझे कि ठीकरा फोड़ना हमेशा आसान होता है। ठीकरा फुड़वाने वाला सिर हरेक को आसानी से नसीब नहीं होता है। शरद पवार साहब की पार्टी राहुल भैया के सिर पर ठीकरा फोड़ना चाहती है, पर इसकी इजाजत कोई दे तब तो। वैसे राहुल भैया के सिर पर ठीकरा फोड़ने की इच्छा रखने वाले खुद कांग्रेस में भी निकल आएंगे। पर पहले ही साफ कर दिया गया है कि यह सिर ठीकरे के लिए खाली नहीं है। अलबत्ता मनमोहन सिंह का सिर उपलब्ध है। फिर भी कोई प्रफुल्ल पटेल, कोई थॉमस अपनी जेबों में ठीकरे डाले फिर रहे हैं, मौका मिले तो चुपके से फोड़ आएं। पर हर ठीकरा फोड़ना चाहने वाले का ऐसा नसीब कहां कि मनचाही खोपड़ी पर ठीकरा फोड़ ही ले।
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पब्लिक को ही कहां कोई खोपड़ी उपलब्ध है, अपनी हारों का ठीकरा फोड़ने के लिए!
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