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नियमों की अनदेखी से होते सड़क हादसे: शिक्षा के बावजूद नहीं सुधर रही आदतें, लापरवाही-धैर्य की कमी बढ़ा रही खतरा

विवेक एस अग्रवाल
Updated Tue, 23 Jun 2026 07:59 AM IST

सार

शिक्षा के प्रसार के बाद भी बढ़ती सड़क दुर्घटनाएं और नियमों की अनदेखी यह दर्शाती है कि हमें अपनी मानसिकता सुधारने की जरूरत है।
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सड़क हादसा (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


वाहन चलाने का लाइसेंस पाने से पहले लगभग हर व्यक्ति को एक निर्धारित प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसमें निर्धारित ट्रैक पर वाहन चलाने से लेकर नियम-कायदों तक, हर पक्ष को परखा जाता है। इसके बावजूद, दुर्घटनाएं रुकने का नाम ही नहीं ले रहीं। आंकड़ों के अनुसार, दुनियाभर में सड़क दुर्घटना से प्रतिवर्ष हो रही लगभग 12 लाख मौतों में सर्वाधिक 12-13 प्रतिशत भारत में हो रही हैं। इनमें जान गंवाने वालों में करीब 90 प्रतिशत लोग आर्थिक रूप से कमजोर या मध्यमवर्गीय परिवारों से होते हैं, और अधिकांश युवा होते हैं। अधिक चिंताजनक यह है पिछले कुछ वर्षों में दुर्घटना और उससे होने वाली मृत्यु राष्ट्रीय एवं राज्य हाईवे की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में कहीं अधिक गति से बढ़ रही है।


एक अनुमान के अनुसार, शहरी सड़क दुर्घटनाओं में मृतकों का हिस्सा 60 प्रतिशत से भी अधिक है। मृतकों में केवल वाहन चालक ही नहीं, बल्कि सड़क पार करने वाले और फुटपाथ न होने के कारण सड़क किनारे चलने वाले पैदल यात्री भी बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। हैरानी वाली बात है कि यातायात नियम तोड़ने वालों में 70 फीसदी युवा ही होते हैं। किसी अनपढ़, ग्रामीण, या अक्षम वृद्ध द्वारा नियमोंं का टूटना जानकारी का अभाव या संयोग हो सकता है, किंतु पढ़े-लिखे युवा वर्ग द्वारा ऐसा करना सोचा-समझा आपराधिक कृत्य या आत्महत्या का प्रयास ही माना जाएगा। हालांकि, इनके पीछे सबसे बड़ी वजह जनमानस में बढ़ रही आपाधापी व धैर्य की कमी है।


शहरों में सड़कों को निरंतर चौड़ा किए जाने की वजह से पैदल चलने वालों के लिए पगडंडी भी नहीं बचती।  सड़क पार करने के लिए बनाए गए जेब्रा क्रॉसिंग भी समय के साथ मिट जाते हैं। कई वाहन चालक तो नजर घुमाकर पुलिस की उपस्थिति सुनिश्चित करते हैं। पुलिस न दिखने पर वे रेड लाइट होने के बावजूद दूसरे छोर तक पहुंच जाते हैं। युवा चालक तो बाईं ओर मिलने वाली छूट का फायदा उठाकर नियमों को नजरअंदाज करते हुए चौराहा पार कर जाते हैं। पूरी दुनिया में, विशेष तौर पर विकसित राष्ट्रों में सड़क संबंधी कानूनों के तहत पहला अधिकार पैदल चलने वालों का होता है। भारत में अभी इसे लागू होने में पता नहीं कितना समय लगेगा, क्योंकि सड़कों पर उनके लिए पर्याप्त स्थान ही उपलब्ध नहीं है। पिछले दिनों न्यायालयों ने संज्ञान लेते हुए इस बाबत सरकारों को निर्देशित भी किया, किंतु कार्यवाही के अभाव में अमल कछुआ चाल से हो रहा है।


सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए यह समझना भी जरूरी है कि यातायात नियमों की अनदेखी के बाद होने वाली त्रासदियां कितनी गंभीर होती हैं। यदि नियमों की अनदेखी के पश्चात हुई दुर्घटना को सीधे तौर पर आत्महत्या मान लिया जाए और साथ बैठे सहयात्री को उसे उकसाने का दोषी करार दे दिया जाए, तो शायद मानसिकता में परिवर्तन आए। बीमा कंपनियों द्वारा भी उक्त हादसों को आत्महत्या जैसा मानते हुए दावों का निस्तारण किया जाए, तो संभव है कि जिम्मेदारी का भाव जागृत हो। गलत दिशा में वाहन चलाने वालों को आत्मघाती हमलावर तथा डिवाइडर से कूद कर आने वालों को स्लीपर सेल के रूप में चिह्नित करने से घटना की गंभीरता बेहतर समझ आएगी। इन्सान के मन में मृत्यु की किसी भी रूप से भरपाई नहीं होने की स्पष्टता नियंत्रण में अहम भूमिका निभा सकती है। यह नियम जेब्रा क्रॉसिंग के अतिरिक्त पैदल रोड पार करने वालों पर भी समान रूप से लागू किया जाना चाहिए। सड़क पर सुरक्षा की दृष्टि से संपूर्ण अभियान का फोकस मृत्यु आमंत्रण या आत्महत्या के प्रयास के रूप में केंद्रित करते हुए जिम्मेदारी तय करना महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। अतः, हर स्तर पर सक्षम कार्यवाही करते हुए सड़क दुर्घटनाओं को नियंत्रित करने के प्रयास किए जाने चाहिए।   


edit@amarujala.com
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