मैं जब यूरोप में थी, तब मुझे पैदल चलना बहुत अच्छा लगता था। पैदल चलते-चलते ही मुझे घर दिखते थे, जिनमें से कई घरों की दीवारों पर यह लिखा रहता था कि इनमें कौन कवि, कौन लेखक, कौन चित्रकार, कौन संगीतज्ञ, कौन फिल्मकार, कौन-से वैज्ञानिक कब से कब तक रहा था। मास्को में मैंने मैक्सिम गोर्की और लियो टॉलस्टॉय का, जबकि डब्लिन में विलियम बटलर यीट्स और बर्नार्ड शॉ का घर देखा था। पेरिस के किस बार में अर्नेस्ट हेंमिग्वे बैठते थे, किस कैफे में ज्यां पॉल सार्त्र अड्डा जमाते थे, कहां विक्टर ह्यूगो और कहां मैरी क्यूरी का निवास था, यह सब कुछ दर्ज है। यहां तक कि वर्साय में बांग्ला कवि माइकल मधुसूदन दत्त ने किस घर में कितना वक्त बिताया था, यह भी उस घर की दीवार पर दर्ज है।
सभ्य देशों के सभ्य लोग साहित्य और शिल्प को मर्यादा देते हैं। जिस देश में शिल्प और साहित्य की कद्र नहीं है, वह देश सभ्य नहीं हो सकता। बांग्लादेश की संस्कृति क्या ऐसी है? सांप्रदायिक हमलों के कारण अतीत में भारी संख्या में हिंदू नागरिक बांग्लादेश छोड़ने को विवश हुए हैं। बांग्लादेश के लिए, जो कभी पूर्वी पाकिस्तान था, या जिसे पूर्व बंगाल कहा जाता था, यह बहुत लज्जाजनक है। बांग्लादेश छोड़कर गए हिंदू अपनी मातृभूमि छोड़ने का दर्द अपने साथ लेकर गए और इस कारण हमेशा दुखी रहे और रोते हुए ही उन्होंने दुनिया छोड़ी। किशोरगंज (मैमनसिंह) में चर्चित रवींद्र संगीत गायक देवव्रत विश्वास के घर का, मैमनसिंह में प्रख्यात बांग्ला साहित्यकार शीर्षेंदु मुखोपाध्याय (अब कोलकाता वासी) के घर का, विक्रमपुर में बांग्ला सिनेमा के विख्यात हास्य कलाकार भानु बंद्योपाध्याय के घर का, बरिशाल में दिग्गज बांग्ला कवि जीवनानंद दास के घर का, मैमनसिंह के गौरीपुर में सत्यजित राय के दादा उपेंद्रकिशोर रायचौधुरी के घर का क्या कोई अवशेष अब बचा हुआ है? ढाका के जिंदाबहार लेन के किस घर में विख्यात कलाकार परितोष सेन या वाड़ी के किस घर में नोबेलजयी अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन बचपन में रहते थे, क्या इसका कोई जिक्र है? निश्चय ही नहीं। जिनकी संपत्ति को शत्रु संपत्ति के रूप में चिह्नित किया जाता है, उन्हें गण्यमान्य व्यक्ति के रूप में भला क्यों चिह्नित किया जाएगा?
बांग्ला सिनेमा के दिग्गज निर्देशक ऋत्विक घटक का विशाल पैतृक घर तोड़कर साइकल गैराज बनाया जा रहा है। मैंने सुना है, 1989 में इरशाद सरकार के दौर में वह घर मामूली कीमत पर राजशाही होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज को दे दिया गया था। तब से वह कॉलेज ही उस घर का इस्तेमाल कर रहा है। उस घर के एक हिस्से में कॉलेज प्रशासन ने बहुमंजिली इमारत बनाई है। जिस हिस्से में ऋत्विक घटक और उनके परिवार के लोग रहते थे, कॉलेज प्रशासन उसका भी इस्तेमाल कर रहा है। उसी हिस्से का एक अंश तोड़कर कॉलेज प्रशासन ने साइकिल गैराज बनाने का फैसला किया है। इसी बीच उस घर के एक हिस्से को ध्वस्त कर उसकी ईंटें तक गायब कर दी गई हैं। राजशाही महानगर के मियांपाड़ा में स्थित घटक के पैतृक घर को ध्वस्त करने के विरोध में तेरह सांस्कृतिक संगठनों ने स्थानीय प्रशासन को पत्र लिखे हैं। उनका कहना है कि ऋत्विक घटक के कैशोर्य और तरुणाई की स्मृतियों से जुड़े इस घर को वे उनके म्यूजियम में बदलना चाहते हैं। इसी घर में रहते हुए ऋत्विक घटक ने राजशाही कॉलेजिएट स्कूल और राजशाही कॉलेज में पढ़ाई की और अभिधारा नाम की साहित्यिक पत्रिका का संपादन किया था। राजशाही कॉलेज और मियांपाड़ा के सामान्य गंथागार के मैदान में घटक ने प्रख्यात कथाकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के साथ मिलकर नाट्यचर्चा की थी।
बीती सदी के साठ के दशक में ऋत्विक घटक ने मेघे ढाका तारा, कोमल गांधार और सुवर्णरेखा जैसी फिल्में बनाई थीं। इन सभी फिल्मों में विभाजन और उसके दुखों का जिक्र है। मुझे याद है, तितास एकटि नदीर नाम (तितास एक नदी का नाम है) फिल्म मैंने मैमनसिंह के छायावाणी सिनेमा हॉल में देखी थी। तब मैं स्कूल में निचली कक्षा में पढ़ती थी। उस छोटी उम्र में ही उस फिल्म के जरिये मैंने दरिद्रता के बारे में जाना था। उसके अगले साल यानी 1974 में मैंने अपने ही शहर में भीख मांगने के लिए आए लोगों की कतारें देखी थीं। उन सबका शरीर हड्डियों का ढांचा मात्र था। मैंने सुना था कि शत्रु संपत्ति का नाम बदलकर अब अर्पित संपत्ति कर दिया गया है। लेकिन नाम बदलने के बावजूद मानसिकता नहीं बदली है। अगर बदलती, तो उन संपत्ति के दावेदार उन पर अपना दावा कर सकते थे। विभाजन जैसा भीषण और कुछ भी नहीं था। विभाजन ने लाखों लोगों को अपनी जमीन से उजाड़ कर बेघर कर दिया। मनुष्य का घर तो टूटा ही, उससे भी ज्यादा उनका दिल टूट गया। दसियों लाख लोग मारे गए। उसके बहत्तर साल बाद भी लोगों के दिल से घृणा और विद्वेष की भावना नहीं गई है। बेहतर हो कि बांग्लादेश सरकार ऋत्विक घटक के पैतृक घर को विध्वंस से बचाने के लिए कदम उठाए। पूरा जीवन पूर्व बंगाल के छूट गए घर और वहां की मिट्टी के लिए घटक रोते रहे थे। उस मिट्टी से शारीरिक तौर पर अलग हो जाने के बावजूद मानसिक या सांस्कृतिक रूप से उन्हें अलग करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। ऋत्विक घटक जैसी विस्मयकारी प्रतिभा की स्मृतियों को बचाने के लिए बांग्लादेश की सरकार अगर इतना भी करे, तो वह काफी होगा। और सिर्फ ऋत्विक घटक ही क्यों, बांग्लादेश की मिट्टी में जिन भी चर्चित प्रतिभाओं ने जन्म लिया है, उनके घरों को सुरक्षित रखने का काम होना चाहिए। सबसे अच्छा हो, अगर शत्रु संपत्ति कानून को ही पूरी तरह बदल दिया जाए।
मैंने सुना है, पश्चिम बंगाल के चर्चित गायक नचिकेता बांग्लादेश में अपने पूर्वजों के घर में पहुंचकर बिलख-बिलख कर रोए थे। ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती कि पूर्वजों के पुराने घर में, जब तक और जब भी इच्छा हो, जाना और रहना संभव हो सके! जब भारत ने कहा है कि मुस्लिम शरणार्थियों को अपने यहां जगह नहीं देगा, तब बांग्लादेश इसके उलट कदम उठाकर अपना बड़प्पन दिखा सकता है। सिर्फ अपने धर्म के लोगों को शरण देना बड़प्पन नहीं है, महत्व तो इसमें है, जब सभी के प्रति समान व्यवहार किया जाए।