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विराट का खतरा

Thu, 22 Jun 2017 07:20 PM IST
कुमार प्रशांत
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कुमार प्रशांत
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वैसे तो खेल और राजनीति में कोई सीधा रिश्ता होता नहीं है या कहूं कि होना नहीं चाहिए, लेकिन हुआ ऐसा कि जिस दिन भाजपा ने राष्ट्रपति पद का अपना उम्मीदवार घोषित किया, उसी दिन अनिल कुंबले ने चैंपियंस ट्रॉफी में पराजित हुई भारतीय क्रिकेट टीम के मुख्य कोच के पद से इस्तीफा दे दिया। जैसे राष्ट्रपति के उम्मीदवार के रूप में भाजपा ने रामनाथ कोविंद को चुनकर कई राजनीतिक समीकरणों को एक साथ बनाने या बिगाड़ने का काम किया है, उसी प्रकार अनिल कुंबले ने मुख्य कोच के पद से इस्तीफा देकर कई तरह के संकेत दिए हैं और कितने ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
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इस इस्तीफे का पहला संकेत तो यही है कि भारतीय क्रिकेट की सलाहकार समिति को, जिसमें सचिन तेंदुलकर, सौरभ गांगुली और वी.वी.एस. लक्ष्मण आते हैं, अपनी जिम्मेवारी से तुरंत हट जाना चाहिए। इन तीनों पर यह जिम्मेवारी थी कि वे व्यक्तियों का चयन ही नहीं करते, उन स्वस्थ परंपराओं का चयन व संरक्षण  करते, जिनसे भारतीय क्रिकेट लगातार वंचित होता रहा है। सचिन-सौरभ-लक्ष्मण की तिकड़ी अपने खिलाड़ियों को संयम और सादगी समझाने में विफल ही नहीं रही, बल्कि उसने इनके सामने हथियार डाल दिए। इस हारी हुई तिकड़ी को अब मैदान से हट जाना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारतीय क्रिकेट की गाड़ी को पटरी पर लाने का काम जिस विनोद राय समिति को सौंपा गया है, अब उसे भी जवाब देना चाहिए कि बीसीसीआई के मैदान में यह सब हो क्या रहा है? रामचंद्र गुहा ने इस समिति से इस्तीफा दे दिया, लेकिन न न्यायालय ने, न विनोद राय ने देश को बताने की जरूरत समझी कि यह क्यों हुआ।  क्रिकेट तो एक संपूर्ण खेल है, जिसकी अपनी परंपराएं हैं, अपनी नैतिकता है। इस समिति को बताना चाहिए कि कैसे कोई इन नतीजे पर पहुंचा कि कुंबले का सर कलम करना चाहिए और विराट का सलामत रखना चाहिए? 
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सवाल यह नहीं है कि विराट या कुंबले में से किसकी चलनी चाहिए; सवाल यह है कि कोच और कप्तान की जो लक्ष्मण-रेखा बनी है, उसे किसने पार किया? जिसने यह किया हो, उसे कदम वापस खींचने होंगे। कुंबले भारतीय क्रिकेट का जो श्रेष्ठ है, उसके मजबूत प्रतीक हैं। खिलाड़ी के रूप में भी, प्रशासक के रूप में भी और खालिस इंसान के रूप में भी कुंबले जैसी ऊंचाई कम ही छू पाते हैं। खिलाड़ी के रूप में  विराट कोहली एक असाधारण प्रतिभा हैं, जिसे अभी खुद को सिद्ध करना है। बीसीसीआई कुंबले का अनुबंध नया न करने का पूरा अधिकार रखती है, लेकिन सलाहकार समिति अनुबंध बढ़ाने की बात करती है और कप्तान के दवाब में उन्हें इस्तीफा देना पड़ता है, यह कैसे स्वीकार किया जाए? आज की स्थिति में हम देखें, तो हमारे पास विराट का विकल्प है, कुंबले का नहीं है। 

चैंपियंस ट्रॉफी की हार की बात करें, जब पिच अनजाना था और उसमें गेंदबाजों के लिए कुछ भी खास नहीं था, तो फिर विराट ने बैटिंग क्यों नहीं ली? उस दिन भारतीय टीम का जितना बुरा प्रदर्शन रहा, उसके बाद कोच अगर कप्तान की खिंचाई नहीं करता है, तो वह कोच बनने लायक नहीं है। सचिन-सौरभ-लक्ष्मण की तिकड़ी को यह कहना चाहिए था कि विराट कुंबले के साथ खेलने का मन और वातावरण बनाए या फिर हमें नया कप्तान चुनना होगा। विराट की प्रतिभा और उनका तेवर, दोनों ही टीम और खिलाड़ियों के लिए अपशकुन बन सकते हैं, यदि उनके बीच कोई ‘कुंबले’ नहीं रहा.  
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