आम तौर पर सत्ता में आने के बाद सरकारें पहले वर्ष में केवल विकासात्मक सुधार पर ध्यान देती हैं। इस दौरान विपक्षी दल भी शांत रहते हैं। सत्तारूढ़ दल और विपक्षी दलों के बीच आक्रामक राजनीतिक खेल लोकसभा कार्यकाल के आखिरी 12 से 15 महीनों के बीच देखा जाता है। हालांकि मौजूदा सरकार को पहले ही वर्ष में राजनीतिक हलचल और आक्रामक विपक्ष का सामना करना पड़ रहा है। कुछ हद तक इसे संघ परिवार के 'घर वापसी' एजेंडे ने हवा दी, जिसे भाजपा सांसदों के सांप्रदायिक और आक्रामक बयानों ने भड़काने में मदद की। कई वैश्विक निवेशक पूछ रहे हैं कि संघ परिवार ऐसी हड़बड़ी क्यों कर रहा है, जिससे मोदी को शर्मिंदा होना पड़ रहा है, खासकर तब जब संसद में आर्थिक सुधार से संबंधित अहम विधेयकों को पारित करने की कोशिशें हो रही थीं। राजनीतिक पर्यवेक्षक भी पूछ रहे हैं कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों के प्रति इतने आक्रामक क्यों हैं, जबकि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) या मेक इन इंडिया कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए मोदी को उनके समर्थन की आवश्यकता है।
भाजपा के करीबी समझे जाने वाले राजनीतिक स्तंभकार स्वप्न दासगुप्ता ने हाल ही में एक अंग्रेजी अखबार में लिखे अपने कॉलम में विकासात्मक सुधार को लेकर राजग सरकार के क्रमिक दृष्टिकोण से संबंधित एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया, जो भाजपा के बेहद आक्रामक राजनीतिक विस्तारवाद (विशेष रूप से उन राज्यों में जहां पारंपरिक तौर पर उसे कमजोर समझा जाता है) के बिल्कुल उलट है। ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की असामान्य राजनीतिक आक्रामकता ने ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और यहां तक कि राजग में शामिल सुखबीर बादल जैसे क्षेत्रीय नेताओं को नाराज कर दिया है। साफ है कि भाजपा का शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण मोदी को क्षेत्रीय नेताओं और विपक्षी दलों के मुख्यमंत्रियों के साथ बड़े सुधार के लिए सहयोगात्मक ढांचा बनाने में मदद नहीं कर रहा है। और संघ परिवार के लोग अपने तरीके से विकास के एजेंडे से मोदी का ध्यान भटका रहे हैं। यह सब विपक्ष को सरकार के खिलाफ बड़ा हथियार दे रहा है, जो राज्यसभा में विधायी सुधारों का मार्ग अवरुद्ध करने पर तुला है। आगामी बजट सत्र के काफी हंगामेदार रहने की संभावना है, क्योंकि विपक्षी दल भाजपा के अध्यादेश राज के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन के लिए कमर कस रहे हैं। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश ने उत्तर भारत के किसानों में व्यापक असंतोष को जन्म दिया है। बजट सत्र में विपक्षी एकता के लिए यह आधार बन सकता है। मौजूदा राजनीतिक हालात से कई सवाल पैदा होते हैं। आखिर इस तथ्य में क्या सामंजस्य है कि एक तरफ तो सरकार अब भी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश कर रही है, दूसरी तरफ अमित शाह कई क्षेत्रीय नेताओं के खिलाफ इस तरह का आक्रामक राजनीतिक आचरण कर रहे हैं। मोदी उन मुख्यमंत्रियों का सहयोग कैसे हासिल कर सकते हैं, जिन्हें लगता है कि भाजपा उनकी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है?
क्या यह हो सकता है कि मोदी और अमित शाह अगले डेढ़ वर्षों तक के लिए विपक्ष और क्षेत्रीय नेताओं को राज्यसभा में सुधारों में अड़ंगा लगाकर खुद को थका लेने का सोचा-समझा राजनीतिक जोखिम ले रहे हैं? हो सकता है कि 2016 के मध्य तक राज्यसभा में भाजपा के संख्याबल में वृद्धि हो जाए, जब उसकी ताकत राज्यसभा में 126 से अधिक यानी आधे से अधिक हो जाए। इस समय उच्च सदन में भाजपा के मात्र 50 सदस्य हैं। वास्तव में यदि यह रणनीति है, तो ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और बादल जैसे क्षेत्रीय नेताओं के खिलाफ अमित शाह की रणनीति में आंतरिक सुसंगति है। हाल ही में नवीन पटनायक ने खुलकर आरोप लगाया कि भाजपा ओडिशा की बीजद सरकार को अस्थिर करने के लिए केंद्र में अपनी सत्ता का दुरुपयोग कर रही है। इसी तरह का आरोप लगाते हुए ममता ने कहा कि उनकी सरकार को डराने के लिए राजग सरकार सीबीआई का दुरुपयोग कर रही है। उसी तरह पंजाब में फैले नशा माफिया के साथ कथित संबंधों के चलते वहां के मुख्यमंत्री के साले और राजस्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया का भी प्रवर्तन निदेशालय पीछा कर रहा है। विडंबना देखिए कि इससे पहले तक भाजपा और बादल के बीच बहुत अच्छे संबंध थे। इसलिए भाजपा का आक्रामक राजनीतिक रुख निश्चित रूप से मोदी के 'सहयोगात्मक संघवाद' का ढांचा तैयार करने में मददगार नहीं होगा, जिसकी वह उम्मीद कर रहे हैं।
हालांकि अमित शाह की रणनीति में जोखिम है। वैश्विक निवेशकों में इतना धैर्य नहीं कि वे 2016 के मध्य तक राज्यसभा में भाजपा के बहुमत हासिल करने का इंतजार करें। वैश्विक निवेशकों के पास दूसरे देशों में जाने का विकल्प है।
मुद्दा यह है कि यदि पहले दो वर्षों में विकास को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक तेजी नहीं दिखाई गई, तो 2016 के मध्य के बाद इसे पुनर्जीवित करना मुश्किल हो जाएगा। वैश्विक निवेशक समुदाय ने मोदी का समर्थन किया है। आप चाहे मानें या नहीं, लेकिन वैश्विक निवेशकों को मोदी से भारी उम्मीदें हैं और उनमें इतना धैर्य नहीं है कि अपने निवेश का लाभ पाने के लिए वे 2016 तक प्रतीक्षा करें। अगर इस समुदाय ने भारत से अपना मुख मोड़ लिया और मोदी की विकसित अर्थव्यवस्थाओं की पिछले वर्ष की यात्रा के दौरान किए गए वायदे के अनुसार भारत में निवेश नहीं किया, तो विनिमय दर और भुगतान संतुलन जैसे आर्थिक संकेतकों पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है। नकारात्मक भावना को खत्म करना मुश्किल होता है, जैसा कि यूपीए ने 2012 में इसके नुकसान से सीखा। इसलिए मोदी को क्षेत्रीय नेताओं के खिलाफ अपनी पार्टी के विद्वेष को कम करना होगा और 2015 में संघ परिवार के अपने गर्म मिजाज बंधुओं पर अंकुश लगाना होगा।