किताबी अर्थशास्त्र हमें बताता है कि उच्च विकास दर का मतलब है कि रुपया मजबूत है। आर्थिक सिद्धांत भी बताते हैं कि कम मुद्रास्फीति में मुद्रा मजबूत होती है। अभी भारत में महंगाई दर मात्र 0.25 फीसदी है। रेटिंग एजेंसियों ने भारत की रेटिंग बढ़ाई है, जिससे रुपये की कीमत बढ़नी चाहिए, पर ऐसा नहीं हुआ। पिछले एक साल में रुपया और नीचे ही गया है। वर्ष की शुरुआत में यह 85.80 पर था, और दिसंबर तक यह लगभग पांच फीसदी तक गिर गया। इन 12 महीनों में डॉलर भी ऊपर-नीचे होता रहा। डॉलर के साथ रुपया भी नीचे गया, पर डॉलर के ठीक होने पर भी वह गिरता रहा। हैरानी नहीं है कि रुपया एशिया में सबसे बुरा प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गई है।
अजीब बात है कि पिछले हफ्ते जारी मौद्रिक नीति संबंधी बयान में इसका जिक्र भी नहीं है, मानो रुपये का गिरना आम बात हो गई है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने प्रेस कान्फ्रेंस में कहा कि रिजर्व बैंक उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए दखल देगा, पर रुपये के लिए कोई लक्ष्य नहीं है। कहा जा सकता है कि रिजर्व बैंक अकेले ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। उसने हाल में दखल दिया है, पर 686 अरब डॉलर के खजाने का इस्तेमाल करने की अपनी सीमाएं हैं।
रुपये में गिरावट का कारण कुछ हद तक प्रणालीगत प्रबंधन है और ज्यादातर पैसे का गणित। सरकार को लगने लगा है कि रुपये में गिरावट ट्रंप के टैरिफ के नखरे और रुके हुए व्यापार वार्ता की वजह से है। जहां भारत व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहा है, वहीं ट्रंप भू-राजनीतिक समझौते पर बातचीत करते दिख रहे हैं। यह सच है कि ऊंचे टैरिफ और अनिश्चितता ने भावनाओं पर असर डाला है। फिर भी, यह गिरती मुद्रा का बहाना नहीं हो सकता। मेक्सिको को अभी समझौते करने हैं और पेसो मजबूत हो रहा है; युआन की कीमत बढ़ी है, हालांकि अमेरिका-चीन समझौता अभी हुआ नहीं है।
रुपये में गिरावट का तात्कालिक कारण असल में आपूर्ति और मांग है। भारत की डॉलर की जरूरतें और डॉलर से होने वाली आय विदेश से आने वाले पैसे और विदेशी प्रत्यक्ष तथा संस्थागत निवेश के प्रवाह से पूरी होती है। भारत सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था है, जो जीडीपी के मामले में चौथे नंबर पर है। फिर भी, भारत को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लाने में मुश्किल हुई है। भारत अपनी हैसियत से बहुत पीछे है और यूएनसीटीएडी की निवेश सूची में 15वें नंबर पर है। इसे अभी 100 अरब डॉलर का आंकड़ा पार करना है।
पैसा सुरक्षा और रिटर्न के पीछे भागता है। भारत 2024-25 में 6.5 फीसदी की दर से बढ़ा और इस साल औसत सात फीसदी से ऊपर है। भारत के बड़े उद्योग स्थिर और घाटे में हैं। महंगाई लक्ष्य के दायरे में है। कॉरपोरेट नतीजे अच्छे रहे हैं। इसका खपत आधार एक अरब से अधिक है। भारत के शेयर सूचकांक रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं, लेकिन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने बाजार से लगभग 18 अरब डॉलर निकाल लिए हैं। हैरानी की बात यह भी है कि नीति-निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों का एक समूह रुपये की गिरावट का स्वागत करता दिख रहा है। बेशक यह गिरावट टाली नहीं जा सकती थी, पर अर्थव्यवस्था की बनावट को देखते हुए गिरावट का जश्न मनाना सही नहीं है। भारत जितना निर्यात करता है, उससे अधिक आयात करता है। पिछले साल भारत ने उर्वरक आयात पर 8.29 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च किए। साल की शुरुआत में 8.29 अरब डॉलर 70,465 करोड़ रुपये था। दिसंबर में यह 74,600 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है-कमजोर रुपया केवल किसानों और सरकारों पर बोझ बढ़ाता है। यह बात भी गलत है कि रुपया सस्ता होने का मतलब है ज्यादा निर्यात। महंगा डॉलर उस अर्थव्यवस्था को नुकसान ही पहुंचाएगा, जो सहायक सामग्रियों (सोना, रत्न, पेट्रोलियम, वस्त्र, चिप, इलेक्ट्रॉनिक्स और दवा सामग्री) के आयात पर निर्भर है। अगर सहायक सामग्रियों (मान लीजिए सोना या कपास) की कीमत बढ़ जाती है, तो क्या भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में मूल्य प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे?
रुपये का मूल्य विकास की मजबूती पर निर्भर करता है। आर्थिक विकास को सार्वजनिक खर्च और निजी खपत से बढ़ाया जा सकता है। भारत ने विकास को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक आधारभूत ढांचों पर जोर दिया है। इस साल, जब आधारभूत ढांचों की कहानी थमी, तो भारत ने निजी खपत को बढ़ाने के लिए आयकर और जीएसटी दर में बदलाव किया। आदर्श रूप में, सतत विकास के लिए सार्वजनिक और निजी खपत, दोनों में संतुलन होना चाहिए। इसके लिए भलाई के चक्र को सक्रिय करना होगा, यानी निवेश से रोजगार, आय, खपत, मांग और फिर निवेश। लेकिन निजी क्षेत्र बड़े निवेश से दूर भाग रहा है। इस संकोच के दृश्य और अदृश्य कारण हैं।
सौ खरब जीडीपी की उम्मीद रखने वाली अर्थव्यवस्था को उद्यमियों की मुश्किलों और विरोधाभासों को दूर करना होगा। उदारीकरण के तीन दशक बाद भी, खेती-बाड़ी में लगभग आधा कार्यबल लगा है और विनिर्माण अब भी जीडीपी के 20 फीसदी तक नहीं पहुंचा है। 2019 से 2024 के बीच, निर्यात जीडीपी 19.8 फीसदी से मुश्किल से 21.2 फीसदी तक बढ़ा है। निर्यात वृद्धि को छोटे और मझोले उद्यम बढ़ाते हैं, लेकिन एमएसएमई विनियामक दबावों और सस्ते ऋण तक खराब पहुंच से जूझ रहे हैं।
विरोधाभासों में सबसे अधिक हैरान करने वाली बात पैसे की कीमत है। इस हफ्ते, रिजर्व बैंक ने ब्याज दर में 0.25 फीसदी की कटौती की, जिससे ब्याज दर 5.25 फीसदी हो गया। सवाल यह है कि ऋण किस दर पर मिलता है। पिछले साल रिजर्व बैंक ने दरों में 1.25 फीसदी की कटौती की है, पर नए ऋण के लिए बैंकों का औसत उधार दर मुश्किल से 0.70 फीसदी कम हुआ है। यानी एएए कंपनियों के लिए ऋण दर 8 फीसदी के आस-पास है और मझोले उद्यम के लिए यह दोहरे अंकों में है।
ट्रंपोनॉमिक्स का सबक यह है कि यदि ध्यान न दिया जाए, तो उसके क्या नतीजे हो सकते हैं। सवाल यह है कि भारत का फायदा किसमें है? भारत ऐसा क्या बना सकता है, जिसके बिना दुनिया नहीं रह सकती?