इस संशोधन के तहत ‘चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज’ (सीडीएफ) का नया पद बनाया गया है, जिसे फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को सौंपा गया है। वह पहले से ही चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ हैं और अब थल, वायु और नौसेना, तीनों पर सीधी कमान रखने वाले पाकिस्तान के एकमात्र व्यक्ति बन गए हैं। इससे सैन्य शक्ति का ऐसा केंद्रीकरण हो गया है, जो पहले कभी नहीं देखा गया। सांविधानिक तौर पर यह पद प्रधानमंत्री से भी अधिक प्रभावशाली बना दिया गया है, जिसे हटाना भी लगभग असंभव कर दिया गया है। मुनीर को आजीवन अभियोजन-छूट भी दे दी गई है-पाकिस्तान में यह अधिकार अब तक किसी निर्वाचित नेता के पास नहीं।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि पाकिस्तान की परमाणु कमान पर अब सेना का नियंत्रण और अधिक मजबूत हो गया है। पहले के ढांचे में, कम से कम औपचारिक रूप से, राष्ट्रीय कमान प्राधिकरण में प्रधानमंत्री की भूमिका दिखाई देती थी। लेकिन अब रणनीतिक व परमाणु फैसलों पर सैन्य वर्चस्व और बढ़ गया है। वह देश, जो भारत के साथ कई बार युद्ध के मुहाने तक पहुंच चुका है, जहां कट्टरपंथी ताकतें एवं सैन्य प्रतिष्ठान मिलकर नीतियां प्रभावित करते हैं, वहां परमाणु निर्णयों का केंद्रीकरण पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बनकर उभर रहा है।
भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी खतरनाक है, क्योंकि पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता और सैन्य श्रेष्ठता का दावा अक्सर भारत-विरोधी आक्रामकता के रूप में सामने आता है। मई 2025 की टकरावपूर्ण घटनाओं के बाद मुनीर की छवि पाकिस्तान में ‘भारत के विरुद्ध निर्णायक नेता’ के रूप में गढ़ी गई है। आसिम मुनीर की सैन्य-चालित नीतियां और राजनीतिक बयानबाजी भारत-पाक संबंधों को लगातार तनावपूर्ण बनाए रखने की दिशा में हैं। मुनीर की आंतरिक वैधता भी काफी हद तक भारत विरोध पर टिकी हुई दिख रही है-जैसा कि इतिहास में कई बार पाकिस्तान में होता आया है। भारत की पश्चिमी सीमाओं पर सीमा पार से आतंकवाद और ड्रोन-आधारित तस्करी बढ़ने की संभावना को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान में जब भी सेना की पकड़ मजबूत होती है, भारत के विरुद्ध ‘लो-इंटेंसिटी वॉरफेयर’ को बढ़ावा मिलता है। मुनीर के कार्यकाल में यह और तेज हो सकती है।
अंदरूनी मोर्चे पर पाकिस्तान पहले ही बड़े संकटों से घिरा है-बलूचिस्तान में अलगाववाद, खैबर पख्तूनख्वा में टीटीपी का फिर से उभार, आर्थिक अव्यवस्था और राजनीतिक ध्रुवीकरण। ऐसा इतिहास कहता है कि जब पाकिस्तान के भीतर परिस्थितियां बिगड़ती हैं, तो उसका ध्यान बाहरी मोर्चे, विशेषकर भारत की ओर मोड़ा जाता है, ताकि घरेलू असंतोष को दबाया जा सके। मुनीर को मिला अभूतपूर्व अधिकार इसी दिशा में संकेत देता है-वह आंतरिक सुरक्षा विफलताओं की भरपाई भारत-विरोधी नीतियों से करेंगे। भू-रणनीतिक दृष्टि से भी यह महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान ने सऊदी अरब और अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग को फिर बढ़ावा दिया है। गाजा में एक संयुक्त मुस्लिम शांति बल में सक्रिय योगदान की पेशकश ने उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कुछ समर्थन दिलाया है। विश्व पहले से ही यूक्रेन, पश्चिम एशिया और इंडो-पैसिफिक के तनावों में उलझा है, इसलिए पाकिस्तान में लोकतंत्र पर हो रहे हमलों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया धीमी है। यह पाकिस्तानी सेना को अपने एजेंडा को निर्बाध रूप से आगे बढ़ाने का अवसर देता है, जिसमें भारत के विरुद्ध कठोर रुख भी शामिल है।
भारत के लिए सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि पाकिस्तान में अब एक ऐसे सैन्य नेता का उदय हो चुका है, जिसके पास कानूनी सुरक्षा कवच भी है और राजनीतिक संस्थाओं को दबाने की क्षमता भी। यह स्थिति भारत के साथ किसी आकस्मिक या गलत-फैसले से उपजे संघर्ष का जोखिम बढ़ा देती है। यदि सीमा पर तनाव बढ़ता है या कश्मीर से जुड़े मसलों को फिर उकसाया जाता है, तो निर्णय प्रक्रिया अधिक उतावलेपन से संचालित हो सकती है, क्योंकि वहां सैन्य प्रतिष्ठान लोकतांत्रिक जवाबदेही से मुक्त है। इस बदलाव का एक और असर भारत के पड़ोसी क्षेत्रों में देखा जा सकता है। मुनीर सरकार टीटीपी को सुरक्षित पनाह देने का आरोप लगाकर तालिबान पर दबाव बना रही है। इस अस्थिरता के फैलाव का असर भारत की अफगान-रणनीति और मध्य एशिया के साथ संबंधों पर पड़ सकता है। दक्षिण एशिया में शांति तभी संभव है, जब पाकिस्तान अपने भीतर के संकटों को राजनीतिक-सांविधानिक ढांचे से संभाले, न कि सेना के बल पर। भारत को यह भी समझना होगा कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण केवल एक आंतरिक मामला नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती है। भारत की स्थिरता, उसके उत्तर-पश्चिमी सीमा क्षेत्रों की शांति, और आतंकवाद-रोधी रणनीतियों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। भारत को कूटनीतिक, खुफिया और सैन्य स्तर पर सतर्कता बनाए रखनी होगी और अपनी प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने की आवश्यकता होगी।
सवाल यह नहीं है कि पाकिस्तान में अब कौन शासन कर रहा है, बल्कि यह है कि उस शासन का लक्ष्य क्या है और वह अपने उद्देश्यों को पाने के लिए कौन-से तरीके अपनाएगा। जिस पाकिस्तान का निर्माण हो रहा है, वह भारत-विरोधी उन्माद, सैन्य राष्ट्रवाद व बल-आधारित रणनीति पर निर्भर प्रतीत हो रहा है। उसके इतिहास से यह स्पष्ट है कि सैन्य शासन ने न तो स्थिरता दी है और न ही आर्थिक प्रगति। लेकिन इस बार फर्क यह है कि सेना ने अपनी सत्ता को सांविधानिक वैधता का आवरण पहना दिया है। भारत को सतर्क, सावधान व रणनीतिक रूप से तैयार रहना होगा।
दक्षिण एशिया की शांति के लिए जरूरी है कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक व्यवस्था व नागरिक सरकार की भूमिका मजबूत हो। लेकिन जब तक वहां सेना सर्वोच्च सत्ता का केंद्र बनी रहेगी, तब तक भारत को एक ऐसे पड़ोसी की वास्तविकता के साथ जीना होगा, जो अविश्वास, असुरक्षा और शत्रुता की राजनीति को ही अपनी पहचान मानता है। edit@amarujala.com