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खत्म न होने वाले मेले जैसा था बचपन

ऋषि कपूर
Updated Fri, 01 May 2020 04:14 AM IST
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rishi kapoor - फोटो : social media

1970 और '80 के दशक की फिल्मों के आधार पर मेरी छवि एक रोमांटिक स्टार की बन गई थी, जो एक हाथ में गिटार और दूसरे हाथ से एक लड़की को थामे हुए जर्सी पहने, थिरकते हुए कैसानोवा जैसी थी। तीस साल बाद मेरी वह छवि हम तुम (2004) के अलग हो चुके पति, स्टूडेंट ऑफ द ईयर (2012) के गे डीन, डी डे (2013) के डॉन, अग्निपथ (2012) के दलाल और कपूर एंड सन्स के नब्बे वर्षीय नटखट बुजुर्ग आदि के जरिये एक परिपक्व और विभिन्न तरह की भूमिकाएं निभाने वाले अभिनेता की बन गई। मेरे जीवन के ये दो चरण वस्तुतः मेरे जीवन की वास्तविकता के बारे में ही बताते हैं- युवावस्था में इस चमकदार अभिनेता के पास सब कुछ था, और अब यह जमीन से ज्यादा जुड़ा हुआ एक ऐसा पारिवारिक व्यक्ति है, जो अपना सब कुछ सौंप देना चाहता है।



अभिनय मेरे खून में था, लिहाजा इससे बच निकलने का रास्ता नहीं था। जब मैं ऐसा कह रहा हूं, तब मेरे जेहन में सिर्फ कपूर खानदान नहीं, बल्कि मेरी मां की तरफ का मल्होत्रा खानदान भी है। उधर भी अभिनय में उतने ही प्रतिभाशाली लोग थे, जितने प्रतिभाशाली मेरे पिता और उनके रिश्तेदार थे। कपूर खानदान से जुड़ी कहानियों की कमी नहीं है। और मेरी प्रिय कहानी मेरे पिता के दादा बशेश्वर नाथ से जुड़ी हुई है, जो एक तहसीलदार थे और जिन्हें लोग प्यार से दीवान साब कहते थे। छत्तीस साल की उम्र में अपनी प्रेमिका के घर तक एक सुरंग खोदते हुए पकड़े जाने पर उन्हें बर्खास्त कर दिया गया था। उनसे जुड़ी एक और कहानी है। उनके एक वरिष्ठ ब्रिटिश अधिकारी ने जब उनकी घोड़ी को देखकर कहा, 'तेरी घोड़ी अच्छी है', तो उन्होंने उनके साथ खड़ी मेम की ओर देखते हुए कहा था, 'तेरी गोरी अच्छी है।'


मेरे दादाजी ने हमारा नाम नाथ से बदलकर राज कर दिया था। इस तरह पृथ्वीनाथ कपूर पृथ्वीराज कपूर हो गए थे। जीवन के आखिरी दिनों में मेरे दादा जुहू के एक कॉटेज में रहने लगे थे, जिन्हें वह झोपड़ी कहते थे। मैं संयुक्त परिवार में पला-बढ़ा। तब हम माटुंगा के आर पी मसानी रोड स्थित एक बड़े घर में रहते थे। बचपन में हमारे साथ एस पी कृपाराम नाम के एक व्यक्ति रहते थे। मैं उन्हें अपना कोई रिश्तेदार समझता था। लेकिन बाद में मुझे पता चला कि वह हमारे रिश्तेदार नहीं थे। दरअसल मेरे गांधीवादी और बड़े दिल वाले दादा ने एक दिन अपने दोस्त कृपाराम को डिनर के लिए आमंत्रित किया था, और वह आदमी अगले पच्चीस साल तक हमारे यहां रहते रहे।


मेरा बचपन सपना था, एक न खत्म होने वाले मेले की तरह। फिल्म दुनिया के लोग हमारे घर में लगातार आते-जाते रहते थे। हमारे घर से गली तक के एल सहगल, जयंत, के एन सिंह, मदन पुरी, जागीरदार और मनमोहन कृष्ण जैसे हिंदी सिनेमा के दिग्गजों की आवाजाही जारी रहती थी। कपूर खानदान अपने पेशे पर हमेशा गर्व करता था; मनोरंजन उद्योग से जुड़े होने के कारण किसी के मन में कोई पछतावा नहीं था। हमारे कुछ दोस्तों के विपरीत, जिनके माता-पिता उन्हें फिल्मों के प्रति हतोत्साहित करते थे, हम बच्चों को हमारे परिवार वाले स्टूडियो जाने से कभी नहीं रोकते थे।


बचपन से ही फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ाव के कारण मुझे हिंदी सिनेमा के कुछ एतिहासिक पलों का गवाह होने का सौभाग्य मिला। जब मैं छह या सात साल का था, तब एक दिन मेरे दादा ने डब्बू, रितु और मुझे खास तोहफा दिया। वह हम सबको एक छोटी-सी ऑपेल में बिठाकर मुगल-ए-आजम के भव्य सेट पर ले गए। उस फिल्म में वह अकबर की भूमिका निभा रहे थे। पर उस दिन की शूटिंग और दिलीप कुमार तथा मधुबाला की मौजूदगी मुझे आकर्षित नहीं कर रही थी। मैं प्लास्टर ऑफ पेरिस की तलवार तथा दूसरे हथियारों पर मुग्ध था। के आसिफ ने मुझे एक चाकू तोहफे में दिया था, जिसे पाकर मैं फूला नहीं समा रहा था।


एक दिन दादा जी ने के आसिफ को डिनर पर बुलाया। उनके लिए खास पंजाबी व्यंजन बनाए गए थे। जबकि मेरे दादा जी के लिए एक ग्लास लिमिकल (तब वह बहुत लोकप्रिय पेय था) और एक प्लेट सलाद आया। आसिफ साहब यह देखकर चौंक गए। उन्होंने कहा, पापाजी, मैं मुगल-ए-आजम बना रहा हूं, जोधा अकबर नहीं। आपको शहंशाह का किरदार निभाने के लिए खाने में परहेज करने की जरूरत नहीं है। उस दिन से वह मेरे दादाजी के और भी प्रिय हो गए। -खुल्लमखुल्ला  :  ऋषि कपूर अनसेंसर्ड (ऋषि कपूर, मीना अय्यर) के संपादित अंश।

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