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भूख से भड़क सकते हैं दंगे

Sat, 27 Oct 2012 09:11 PM IST
यादवेंद्र
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पिछले कुछ वर्षों से विकसित देशों में नियोजित ढंग से सामाजिक अशांति के पूर्वानुमान की अचूक प्रणाली विकसित कर लिए जाने की हवा बनाई जा रही है और इसके शीर्ष विशेषज्ञ प्रो यानीर बार याम हैं, जो अमेरिका में कैंब्रिज स्थित न्यू इंग्लैंड कांप्लेक्स सिस्टम्स इंस्टीट्यूट के कर्ताधर्ता हैं। विगत मार्च में प्रकाशित अपने परचे में उन्होंने लिखा कि वर्तमान में जिस ढंग से दुनिया भर में खाद्यान्न के दाम बढ़ रहे हैं, उनसे हम सामाजिक उपद्रव के मुहाने तक पहुंच गए हैं।
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वर्ष 2008 और फिर 2011 के अरब असंतोष के समय खाद्यान्न की कीमतों का जैसा शिखर था, वैसा ही अब फिर से पहुंच गया है। उनके मुताबिक, अगले साल अरब विद्रोह से भी ज्यादा तीव्र संघर्ष देखने में आएगा। उन्होंने कोलंबिया और गिनी में हाल के महीनों में हुए दंगों का उदहारण भी दिया। परचे में उन्होंने भारत के खाद्यान्न जनित सामाजिक असंतोष की घटनाएं भी दर्शाई हैं। भारत में भूख से जुड़े दंगों के विवरण शायद ही किसी विशेषज्ञ के शोध का विषय बने हों। एक डच बैंक ने भी रिपोर्ट में लिखा है कि 2013 की तीसरी तिमाही तक खाद्यान्न के दाम ऊपर चढ़कर असंतोष का कारण बन जाएंगे।

विश्व खाद्यान्न बाजार के इस बरताव की जो वजह बताई जा रही है, उनमें एक तरफ वायदा कारोबार है, तो दूसरी तरफ धड़ल्ले से मक्के से इथेनॉल बनाने का उद्योग। जहां 2004 में अमेरिका अपने मक्के की फसल का 15 फीसदी इथेनॉल बनाने में झोंकता था, वह अब इसका आधे से ज्यादा भाग ईंधन बनाकर गरीबों की रोटी छीनने का खेल खेल रहा है।
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जग जाहिर है कि अमेरिकी अन्न व्यापारी मांग और आपूर्ति के बीच का संतुलन मन माफिक मरोड़ सकते हैं, जिसका असर उन देशों पर सीधा पड़ेगा, जो अपनी जरूरत का अधिकांश हिस्सा आयात करते हैं। इस समय ईरान से खाद्यान्न की बेहद ऊंची कीमतों के कारण सुलग रही आग की खबरें धीरे-धीरे दुनिया भर में फैल रही हैं। यूनान और स्पेन मितव्ययिता के जिस अभियान में जुटे हैं, उनमें लोगों की पहुंच के बाहर जा रही खाद्यान्न की कीमतों के कारण बढ़ता जन असंतोष किसी भी समय दंगों का रूप ले ले, तो अचरज नहीं।

एक रिपोर्ट बताती है कि महंगे मक्के की वजह से 2005 और 2010 के बीच मैक्सिको को खाद्यान्न आयात पर 1.1 अरब, मिस्र को 7270 लाख, ईरान को 4920 लाख, अल्जीरिया को 3290 लाख, सीरिया को 2420 लाख और मोरक्को को 2360 लाख डॉलर अतिरिक्त खर्च करने पड़े।

हालांकि भारत आयातित अन्न पर निर्भर देश नहीं है, पर यहां पिछले वर्षों की महंगाई में सबसे ज्यादा भाव खाद्यान्न के ही बढ़े हैं, अन्न का उचित मूल्य न मिल पाने और साधनहीनता के कारण बड़ी संख्या में किसान खेती से विमुख हो रहे हैं। औद्योगिक और शहरी तरक्की के लिए खेती की भूमि को अंधाधुंध ढंग से निगला जा रहा है और अन्न भंडारण की जो शर्मसार करने वाली दुर्दशा है, उसको देखते हुए यहां की साधनहीन जनता का धैर्य भी चुकने लगे, तो आश्चर्य नहीं।

प्रो यानीर बार याम को भारत से बढ़िया उदाहरण कहां मिलेगा, जहां कृषि और खाद्यान्न का जिम्मा संभाले मंत्री जिस इलाके का प्रतिनिधित्व करता है, वहां लाचार किसानों की आत्महत्याओं के सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं, और जहां वोट की खातिर प्रकाश सिंह बादल मृत गाय का स्मारक तो बनवा सकते हैं, पर आत्महत्या करते किसानों पर अफसोस नहीं जता सकते।

पूरी दुनिया की गरीब जनता के लिए यह सचेत हो जाने की घड़ी है, क्योंकि प्रो यानीर बार याम जैसे वैज्ञानिक के शोध के नाम पर पहले से फैलाई गई बातों को सही साबित करने के लिए सुनियोजित ढंग से बाजार नियंत्रित कृषि अनुसंधान को चौपट करने की बिसात बिछाई जा चुकी है। भविष्य के पूर्वानुमान के ऐसे क्लब ऑफ रोम सरीखे पश्चिमी स्कूल पहले भी कई बार दुनिया के विनाश की दुंदुभी बजा चुके हैं, पर फलती-फूलती मानवता प्रगति के पथ पर अग्रसर होती रही है। यह समय देश के बुनियादी शक्ति तंत्र के विभिन्न पहलुओं पर नए सिरे से विमर्श करने और सामाजिक समरसता को चुराने वाले बहुरूपियों से सजग रहने का है।
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