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बाराती होने का अधिकार

Mon, 21 Apr 2014 07:01 PM IST
मनोज लिमये
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राजा की आएगी बारात, रंगीली होगी रात, मगन मैं नाचूंगी गीत से बारात के महत्व एवं उल्लास का पूरा विवरण मिल जाता है। संविधान ने हम नागरिकों को अनेक अधिकार दिए हैं। बाराती बनना भी उसी तरह का एक मौलिक अधिकार है, हालांकि संविधान में इसका कहीं कोई जिक्र नहीं है। हर आदमी अपने जीवन में कम से कम एक बार तो इस अधिकार का इस्तेमाल करता ही है। बाराती बनना किसी को सिखाया नहीं जाता, व्यक्ति यह नैसर्गिक गुण साथ लेकर पैदा होता है। हां, अनुभव के साथ इस कला में निखार आता जाता है।
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दरअसल देवों के उठने के साथ ही आम भारतीय मन हिरण की तरह कुलांचे मारने लगता है। इस मौसम में उसे बाराती बनने का सौभाग्य जो प्राप्त होता है। जिस मध्यवर्गीय बाबू के जीवन का सूरज टेबल पर पडी फाइलों में ही उदय और अस्त होता आया हो, जो शख्स सब्जी मंडी में लौकी-टमाटर का भाव-ताव करने हेतु प्रसिद्धि के शिखर पर हो, ऐसे व्यक्ति के मस्तक पर यदि गुलाबी रंग का साफा बांध दिया जाए, तो सोचिए, उसकी स्थिति क्या होगी? साफे का बोझ संभालने हेतु उसे अपने व्यक्तित्व से क्या-क्या लड़ाई लड़नी पड़ती होगी।

आदर्श बारात में बैंड, उसके पीछे घोड़ी, उस पर दूल्हा और उसके पीछे महिला-पुरुषों का इत्रमय हुजूम। इन सबके आगे होता है बारात का महत्वपूर्ण सदस्य, जो पटाखों के संचालन का काम करता है। कुछ बाराती सांकेतिक भाषा में भौंहें उचकाकर 'व्यवस्था क्या है’ का सवाल करते हैं तथा बीच-बीच में एक बहुत जरूरी काम के लिए अदृश्य होते रहते हैं।
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बारात जब दुल्हन के द्वार पर पहुंचती है, तब वहां बारातियों का बाराती गुण अपने शबाब पर होना जरूरी है। द्वार पर अधिकाधिक नृत्य प्रदर्शन करना अच्छी बारात होने का प्राथमिक लक्षण माना जाता है। बारात को दरवाजे के भीतर धकेल कर दुल्हन का पिता यह समझ लेता है कि पहली लड़ाई उसने जीत ली है। अब सात फेरों से विदाई तक बारात संभल जाए, तो ठीक, वरना राम ही राखे।
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